Bhagvat sharan upadhyay ka jeevan parichay डॉ भगवतशरण उपाध्याय का जीवन परिचय

By | September 16, 2016

जीवन परिचय-डॉक्टर भगवतशरण उपाध्याय का जन्म बलिया जिले के उजियारीपुर ग्राम में सन 1910 ईस्वी में हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई। आपने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास विषय में एम ए की उपाधि प्राप्त की। आप संस्कृत साहित्य एवं पुरातत्व के अध्यक्ष थे। हिंदी साहित्य के प्रमुख नायकों में आप जाने जाते हैं। पुरातत्व में विशेष रुचि के कारण आप कलकत्ता पुरातत्व विभाग, प्राग संगृहालय एवं लखनऊ संग्राहालय के अध्यक्ष रहे। आपने पिलानी में इस्थित बिडला महाविद्यालय में अध्यापन का कार्य भी किया। इसके पश्चात आप ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग में प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष के पद पर कार्य किया और वही से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात देहरादून में रहकर साहित्य साधना में रत रहे। सन 1982 ईस्वी में आप का असामयिक निधन हो गया ।
कृतियाँ –उपाध्याय जी ने यूरोप, अमेरिका, चीन आदि देशों का कई बार भ्रमण किया और भारतीय संस्कृति एवं साहित्य पर बहुत से महत्त्वपूर्ण व्याख्यान भी दिए। शताधिक ग्रंथों की रचना कर आपने हिंदी साहित्य को समृद्ध कर अपना स्तुत्य योगदान प्रदान किया। आपने मौलिक एवं स्वतंत्र विचारों के लिए आप प्रसिद्ध है। विश्व साहित्य की रूपरेखा, साहित्य और कला, खून के छीटे, इतिहास के पन्नों पर, कलकत्ता से पीकिंग, कुछ और कुछ,
एकांकी- इतिहास साक्षी है, ठूँठा आम, सागर की लहरों पर, विश्व को एशिया की देन, मंदिर और भवन, इंडिया इन कालिदास, वूमेन इन ऋग्वेद, फैंसी एंड वर्ल्ड आदि इन की प्रमुख रचनाएं हैं।
भाषा- उपाध्याय जी की भाषा दो रूपों में देखने को मिलती है एक संस्कृतनिष्ठ शुद्ध साहित्यिक भाषा और दूसरी तद्भव शब्दों से युक्त मृदु सरल एवं सरस भाषा। आपने मुहावरों और लोकोक्तियों का भी प्रभावपूर्ण ढंग से प्रयोग किया है। अपनी रचनाओं में अन्य भाषाओं के शब्दों का भी सहज भाव से प्रयोग किया है।
शैली- उपाध्याय जी ने विषय एवम प्रसंगों के अनुसार विभिन्न शैलियों का प्रयोग किया है। इतिहास और पुरातात्विक संबंध निबंध लेखन में वर्णात्मक शैली, साहित्य और कला, कालिदास आदि रचनाओं में समीक्षात्मक शैली दृष्टव्य है। कलाकृतियों परिचय में भावात्मक शैली का प्रयोग भी देखने को मिलता है। हिंदी में इतिहास और पुरातत्व की कलात्मक प्रस्तुति करने वाले उपाध्याय जी का हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान है।

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