Bhartendu harishchandra ka jeevan parichay भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय

By | September 6, 2016

>> जीवन परिचय- युग प्रवर्तक कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी के एक संपन्न वैश्य परिवार में सन् 1850 ईस्वी के सितंबर माह में हुआ था। इनके पिता गोपाल चंद्र जी ‘गिरिधर दास’ उपनाम से काव्य रचना करते थे । भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 7 वर्ष की अवस्था में ही एक दोहे की रचना की जिसको सुनकर पिता ने इनको महान कवि बनने का आशीर्वाद दिया। 10 वर्ष की अवस्था में ही भारतेंदु हरिश्चंद्र माता पिता के सुख से वंचित हो गए थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई जहां उन्होंने हिंदी, उर्दू, बंगला एवं अंग्रेजी का अध्ययन किया। इसके पश्चात क्वींस कॉलेज वाराणसी में प्रवेश लिया किंतु काव्य रचना में रूचि होने के कारण इन का मन अध्ययन में नहीं लगा और इन्होंने शीघ्र ही कॉलेज छोड़ दिया । इनका विवाह 13 वर्ष की उम्र में ही मन्नो देवी के साथ हो गया था । काव्य रचना के अतिरिक्त इनकी रूचि यात्राओं में भी थी । 15 वर्ष की अवस्था में ही जगन्नाथ पुरी की यात्रा के पश्चात ही इनके मन में साहित्य सृजन की इच्छा अंकुरित हुई थी। भारतेंदु जी बहुत उदार एवं दानी थे । उदारता के कारण शीघ्र ही इनकी आर्थिक दशा सोचनीय हो गई और ऋणग्रस्त हो गए छोटे भाई ने भी इनकी दानशीलता के कारण संपत्ति का बंटवारा करा लिया था । ऋणग्रस्तता के समय ही यह क्षय रोग के शिकार हो गए थे । इन्होंने रोग से मुक्त होने का हरसंभव प्रयत्न किया किंतु रोग से मुक्ति नहीं हो सके सन 1885 ईस्वी में इसी रोग के कारण मात्र 35 वर्ष की अल्प आयु में ही भारतेंदु जी का स्वर्गवास हो गया।
>> साहित्यिक सेवाएं – भारतेंदु हरिश्चंद्र एक प्रतिभासंपन्न एवं युग प्रवर्तक साहित्यकार थे। अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य के विकास में अमूल्य योगदान दिया। मात्र 18 वर्ष की आयु में इन्होंने ‘कवि-वचन-सुधा’ नामक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन किया । कुछ वर्षों के उपरांत ‘हरिश्चंद्र’ मैगजीन का संपादन एवं प्रकाशन भी प्रारंभ कर दिया । नाटक एवं कविता के क्षेत्र में इनकी प्रतिभा का सर्वाधिक विकास हुआ । यह अनेक भारतीय भाषाओं में कविता करते थे, किंतु ब्रजभाषा पर इनका विशेष अधिकार था । हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए इन्होंने ना केवल स्वयं साहित्य का सृजन किया अपितु अनेक लेखकों को भी इस दिशा में प्रेरित किया । सामाजिक, राजनीतिक एवं राष्ट्रीयता की भावना पर आधारित अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतेंदु जी ने एक नवीन चेतना उत्पन्न की। इनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर तात्कालीन पत्रकारों ने सन 1880 ईसवी में इन्हें भारतेंदु की उपाधि से सम्मानित किया।
>> रचनाएं – अल्प आयु में ही भारतेंदु जी ने हिंदी को अपनी रचनाओं का अप्रतिम कोष प्रदान किया इनकी प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित है-
>> काव्य कृतियां – ‘भक्त सर्वस्व’ भक्ति भावना पर आधारित यह रचना ब्रज भाषा में लिखी गई है।
‘प्रेम माधुरी’, प्रेम तरंग, प्रेम स्वरुप वर्णन, दानलीला, प्रेम सरोवर एवं कृष्ण भक्ति, भक्ति तथा दिव्य प्रेम पर आधारित रचनाएं हैं ।
भारत वीरत्व, विजय वल्लरी, विजयिनी, विजय पताका आदि देश प्रेम की रचनाएं हैं ।
बंदर सभा एवं बकरी विलाप में हास्य व्यंग शैली के दर्शन होते हैं ।
>> नाटक- ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’,  चंद्रावली,  भारत दुर्दशा, नीलदेवी एवं अंधेर नगरी आदि ।
>> उपन्यास- पूर्ण प्रकाश, चंद्रप्रभा यह दोनों सामाजिक उपन्यास है ।
>> यात्रा वृतांत-   सरयू पार की यात्रा, लखनऊ की यात्रा । इसके अतिरिक्त जीवनियां इतिहास और पुरातत्व संबंधी रचनाएं भी इनकी प्राप्त होती है।
>> भाषा शैली- भारतेंदु जी का खड़ी बोली एवं ब्रजभाषा दोनों पर ही समान अधिकार था । उन्होंने अपने काव्य के सृजन हेतु ब्रज भाषा को ही अपनाया साथ ही प्रचलित शब्दों मुहावरो एवं कहावतों का यथास्थान प्रयोग किया है । उन्होंने मुख्य रूप से मुक्तक शैली का प्रयोग किया। इनके द्वारा प्रयुक्त शैली प्रवाहपूर्ण, सरल एवं भावपूर्ण है।

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