Bihari lal ka jeevan parichay बिहारी लाल का जीवन परिचय

By | September 16, 2016

जीवन परिचय-रीति काल के प्रतिनिधि बिहारी का जन्म सन 1636 ईसवी में ग्वालियर के बसुआ गोविंदपुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। इनकी बाल अवस्था बुंदेलखंड में और तरुणावस्था अपनी ससुराल मथुरा में बीता था ।
जन्म ग्वालियर जानिए, खंड बुंदेले बाल ।
तरुणाई आई सुधर, मथुरा बसि ससुराल ।।

कवि बिहारी जयपुर नरेश महाराजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। कहा जाता है कि महाराजा जयसिंह ने दूसरा विवाह किया था। वह अपनी पत्नी के साथ भोग विलास में व्यस्त थे। महाराज जय सिंह की यह दशा देखकर बिहारी में दोहा लिखकर उनके पास भेजा ।
नहीं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल ।
अली कली ही सौं बंधुओं, आगे कौन हवाल ।।

इस दोहे को पढ़कर राजा जयसिंह बहुत प्रभावित हुए और पुनः कर्तव्य पथ पर अग्रसर हो गए। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बिहारी भक्ति और वैराग्य की ओर उन्मुख हो गए और दरबार छोड़कर वृंदावन चले गए वहीं सन् 1663 इसमें उन्होंने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया। रचनाएं-रीतिकालीन कवियों में उनकी गणना प्रतिनिधि कवि के रुप में की जाती है। कविवर बिहारी की एकमात्र कृति बिहारी सतसई उपलब्ध है। इसमें 700 दोहों एवं का संग्रह है। इनके दोहे विभिन्न विषय एवम भाव से युक्त है। इन्होंने अलंकार, नायिका भेद, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव संबंधित जो उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की है वह अद्भुत है।
काव्यगत विशेषताएं-बिहारी का काव्य भाव एवं कलापक्ष दोनों ही दृष्टि से श्रेष्ठ है। रीतिकालीन काव्य की विशेषताएं उनकी रचनाओं में उपलब्ध है। बिहारी श्रृंगार रस के भेद संयोग श्रृंगार का समान रूप में ही किया है। बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है। जिसमें पूर्वी हिंदी, बुंदेलखंडी उर्दू, फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। शब्द रचना चयन की दृष्टि से बिहारी अद्वितीय है। बिहारी ने मुक्तक काव्य शैली को अपनाया है। जिसमें समास शैली का अनूठा प्रयोग है। अलंकारों के प्रयोग में बिहारी दक्ष थे। उन्होंने छोटे-छोटे दोहों में अनेक अलंकारों को भर दिया है। उनके काव्य में श्लेष, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति और अतिश्योक्ति अलंकारों का अधिक प्रयोग हुआ है।
साहित्य में स्थान- बिहारी की सतसई नामक काव्य रचना हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। सौंदर्य प्रेम के चित्रण में भक्ति और नीति के समन्वय ज्योतिष गणित दर्शन के निरूपण में तथा भाषा के लक्षण एवं व्यंजक प्रयोग की दृष्टि से बिहारी बेजोड़ है। भाषा और शिल्प की दृष्टि से सतसई काव्य श्रेष्ठ है।

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