Dulan Das ka jivan prichay दूलनदास का जीवन परिचय

By | July 14, 2016

दूलनदास (जन्म- 1660 ई., लखनऊ; मृत्यु- 1778 ई.) रीति काल के प्रसिद्ध कवि और सतनामी सम्प्रदाय के संत-महात्मा थे। वे जाति से क्षत्रिय तथा गृहस्थ थे। ये जगजीवन साहब के शिष्य थे। इन्होंने ‘धर्मो’ नाम का एक ग्राम भी बसाया था। इनका सारा समय साधु-संगत, भजन-कीर्तन और उपदेश देने में व्यतीत होता था। इन्होंने साखी और पद आदि की भी रचनाएँ की हैं।
विषय सूची
1 सतनामी संत
1.1 भाषा तथा उपदेश
2 पद
सतनामी संत

सतनामी सम्प्रदाय का आरम्भ कब और किसके द्वारा हुआ, यह तो ठीक से ज्ञात नहीं है, किंतु सतनामियों और मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के बीच की लड़ाई में हज़ारों सतनामी मारे गये थे। इससे प्रतीत होता है कि यह मत यथेष्ट प्रचलित था और स्थानविशेष में इसने सैनिक रूप धारण कर लिया था। संवत 1800 के लगभग जगजीवन साहब ने इसका पुनरुद्धार किया। दूलनदास इन्हीं के शिष्य थे, जो एक अच्छे कवि थे। ये जीवनभर रायबरेली में ही निवास करते रहे।
भाषा तथा उपदेश
दूलनदास की भाषा में भोजपुरी का मिश्रण है। अन्य संतों की भाँति गुरुभक्ति, समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम तथा निर्गुण, निराकार परमात्मा की प्राप्ति यही इनके उपदेश हैं।
पद

दूलनदास ने असंख्य पदों की रचना की है। कुछ इस प्रकार हैं-
जोगी चेत नगर में रहो रे।
प्रेम रंग रस ओढ चदरिया मन तसबीह महोरे॥

अंतर लाओ नामाहिं की धुनि करम भरम सब घोरे॥
सूरत साधि गहो सत मारग भेद न प्रगट कहो रे॥
‘दूलनदास’ के साँई जगजीवन भवजल पार करो रे॥
ऐसो रंग रँगैहौं मैं तो मतवालिन होइहौं॥
भट्टी अधर लगाइ नाम की सोज जगैहौं।

पौन सँभारि उलटि दै झोंका करवट कुमति जलैहौं॥
गुरुमति लहन सुरति भरि गागरि नरिया नेह लगैहौं।
प्रेम नीर दै प्रीति पुजारी यही बिधि मदबा चुबैहौ॥
अमल ऍंगारी नाम खुमारी नैनन छबि निरतैहौं।
दै चित चरन भयूँ सत सन्मुख बहुरि न यहि गज ऐहौं॥
ह्वै रस मगन पियों भर प्याला माला नाम डोलैहौं।
कह ‘दूलन’ सतसाईं जगजीवन पिउ मिलि प्यारी कहैहौं॥
रज्जब जी
रज्जब जी सांगानेर नवाब के पुत्र थे
षोड़श वर्ष भये रज्जब तन, ब्याहन अम्बपुरी मधि आये ।
सम्मुख संत मिले गुरु दादु जु, देखत ही उपदेश सुनाये ।
देह रची हरिनाम भजो तन, जीव उधारन औसर पाये ।
ता सब छाड़ि विषै रस चाखत, कंचन देह जु धूरि मिलाये ॥ ११ ॥
सोलह वर्ष की अवस्था में रज्जब जी विवाह रचाने अम्बापुरी आये । वर यात्रा के सम्मुख संत श्री दादूजी मिले । संत उन रज्जबजी को देखते ही पहिचान गये कि वह हरिभक्ति करने वाला जीव है, अत: तुरन्त उपदेश सुनाया – “ईश्‍वर ने यह शरीर – वृति राम – नाम भजने को रची है, जीव के उद्धार व कल्याण करने का यही मनुष्य जन्म तो एक मात्र अवसर मिला है । उस दुर्लभ अवसर का सदुपयोग छोड़कर, विषय – वासनाओं में उलझने कहाँ जा रहे हो, अपनी कंचन समान देह को धूल में क्यों मिला रहे हो । विषयों का रस चखते – चखते कभी तृप्ति नहीं होती है, और यह दुर्लभ शरीर जीर्ण क्षीण हो जाता है, अवसर हाथ से निकल जाता है । अत: समय रहते सचेत हो जाओ, श्री हरि का भजन कर अपना कल्याण करो” ॥ ११ ॥
कीया था इस काम को, सेवा कारण साज ।
दादू भूला बन्दगी, सर्या न एको काज ।।

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यों सुनि बेगि पर्यो चरणां मधि, कंकण डोरहिं भ्रात बंधाना ।
आप दया करि शीश धर्यो कर, तत्व सुनाय दियो निज ज्ञाना ।
शंकर शेष जपैं सनकादिक, सो निज जाप दियो दृढ़ ध्याना ।
दूलह अम्मर स्वांत बनो तुम, सांगानेर भजो भगवाना ॥ १२ ॥
संत उपदेश सुनकर रज्जबजी की अन्तर चेतना जाग गई । तुरन्त हाथी से उतर कर संत चरणां में गिर पड़े । विवाह का कंगन डोरा, अपने भाई के हाथ और सिर में में बांध दिया । अपनी जगह उसे विवाह रस्म के लिये भेज दिया, और गुरु दीक्षा के लिये प्रार्थना करने लगे । स्वामीजी ने दया करके सिर पर हाथ धरा, और तत्वज्ञान की दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया । जिस नाम को शंकर, शेष, सनकादिक जपते रहते हैं, वह नाम जाप बताकर दृढ़ ध्यान के लिये कहा और समझाया कि अपनी १. अन्त: – करण वृति को अमर दुल्हा से मिलाओ( श्री हरि की भक्ति व प्रीति में लगाओ ) फिर वह सदा सुहागिन रहेगी । २. वह अमर दुल्हा( दुर्लभ है ) । विषय वासनाओं में आसक्त जन साधारण उसे नहीं पा सकता । ३. जो अपने स्व का अन्त कर लेता है, ममत्व को, अहं को मिटा देता है – उसे वह दुर्लभ अमर दूल्हा मिलता है । ४. तुम इस दूल्हावेश में ही भजन साधना करते हुये अमरत्व को प्राप्त करो । क्योंकि इसी वेश में तुम्हें गुरु प्राप्ति हुई है, दीक्षा मिली है । इस तरह चार व्याख्याओं के रहस्य युक्त उपदेश देकर स्वामीजी ने आदेश दिया कि अब तुम अपने स्थान सांगानेर में रहते हुये ही भजन साधना करो ॥ १२ ॥

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नोट : रज्जबजी कंकण डोरा सेवरा, छोटे भाई के बांधने से बरात आगे रू गई, रूकना स्वभाविक ही था, दुल्हा के बिना बारात कहां जावे, लेकिन रज्जबजी के पूर्व जन्मों के संस्कार थे, उनको कौन रोक सकता था, तुरंत सुनते ही परम सत्गुरू के चरणों में गिर पड़े, यह पूर्व भक्ति, संस्कार किसी किसी में होते हैं, वह अच्छे मनुष्य जन्म पाकर पुन: भक्ति ज्ञान मार्ग में लग जाता है । रज्जबजी ने अपनी वाणी में कहा है :-
रज्जब तैं गज्जब कीया, शिर पर बाधा मोर |
आया था हरि भक्ति को करी नरक कों ठोर ||
बारात में ४०० पठाण थे । रात को बारी – बारी से श्रीदादूजी के स्वरूप पर खाण्डे चलाये, लेकिन श्रीदादूजी का क्या बिगड़ता था, श्रीदादूजी तो केवल आकृति स्वरूप थे, पाच तत्वों का शरीर नहीं था, सवेरे चार बजे तब दरबार की तोप छूटी तब सारे घबरा गये कि, अब क्या करें सभी ने विचार कया दादूजी से माफी मांगी, सभी ने कहा गुरूदेव हमारी गलती हो गई, हम सबको माफ करीये, हम भी आपके सेवक है, श्रीदादूजी ने कहां हां भाई आप लोग भी सेवक हो, कोई तो हाथों से सेवा करता है, आप लोगों ने खाण्डो से की है तब सभी ने कहा गुरूदेव हमारे रज्जब पर आपने दोष कर दिया, दादू जी ने कहा :-
जिसका था तिसका हुआ तो काहे का दोष |
दादू बन्दा बन्दगी मीयां ना कर रोष ||
जिसका बन्दा था उस मालिक का हो गया इसमें कौन सा दोष है, सत्यराम ।
रज्जब मुसलमान थे। पठान थे। किसी
युवती के प्रेम में थे। विवाह का दिन आ
गया। बारात सजी। बारात चली।
रज्जब घोड़े पर सवार। मौर बाँधा हुआ
सिर पर। बाराती साथ है, बैंड बाजा
है
इत्र का छिड़काव है, फूलों की मालाएँ
है। और बीच बाजार में अपनी ससुराल के
करीब पहुंचने को ही थे। दस पाँच कदम शेष
रह गये थे।
प्रेयसी से मिलने जा रहे था। प्रेम तो
तैयार था, जरा सा रूख बदलने भर की
बात थी।
यह मौका ठीका मौका है। लोहा जब
गर्म हो तब चोट करनी चाहिए। एक
तरह से देखो तो यह मौका एक दम ठीक
था।
कि अचानक घोड़े के पास एक आदमी आया
उसका पहनाव बड़ा अजीब था। कोई
फक्कड़ दिखाई दे रहा था। बारात के
सामने आ कर खड़ा हो गया। और उसने गौर
से रज्जब को देखा। आँख से आँख मिली। वे
चार आंखें संयुक्त हो गयी। उस क्षण में
क्रांति घटी।
वह आदमी रज्जब के होने वाला गुरु थे—
दादू दयाल जी। और जो कहा दादू
दयाल जी ने वे शब्द बड़े अद्भुत है। उन छोटे से
शब्दों में सारी क्रांति छिपी है।
दादू दयाल ने भर आँख रज्जब की तरफ देखा,
आँख मिली ओर दादू जी ने कहा—
रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बांधा
मौर।
आया था हरी भजन कुं, करे नरक की ठौर
बस इतनी सी बात। देर न लगी, रज्जब
घोड़े से नीचे कूद पड़ा, मौर उतार कर फेंक
दिया, दादू के पैर पकड़ लिए। और कहा
कि चेता दिया समय पर चेता
दिया….और सदा के लिए दादू के हो गये
छाया की तरह दादू दयाल के साथ रहे
रज्जब, उनकी सेवा में !!वे चरण उसके लिए सब
कुछ हो गये। उन चरणों में उसने सब पा
लिया। अद्भुत प्रेमी रज्जब। जब दादू
दयाल अंतर्धान हो गये।
जब उन्होंने शरीर छोड़ा,तो तुम चकित
हो जाओगे…..शिष्य हो तो ऐसा हो।
रज्जब ने आँख बंद कर लीं। तो फिर कभी आँख
नहीं खोली।
कई वर्षों तक रज्जब जिंदारहे , दादू
दयाल के मरने के बाद। लेकिन कभी आँख
नहीं खोली।
लोगों ने लाख समझाया ये बात ठीक
नहीं है।
लोग कहते कि आंखे क्यों नहीं खोलते ???
तो रज्जब कहते देखने योग्य जो था उसे देख
लिया, अब देखने को क्या है ?
जो दर्शनीय था, उसका दर्शन कर
लिया। उन आंखें में पूर्णता का सौंदर्य देख
लिया। अब देखने योग्य क्या है इस संसार
में
अब आँख का काम खत्म हो गया। क्या
करना खोल कर, क्या देखना है।
रज्जब तो कोहिनूर थे।
तुम मानो या न मानों, लेकिन जब बूंद
सागर में गिरती है तो सागर हो
जाती है।

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