mahadevi varma ka jeevan parichay महादेवी वर्मा का जीवन परिचय

By | September 17, 2016

जीवन परिचय- महादेवी वर्मा का जन्म 24 मार्च 1907 ईस्वी में होली के दिन फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) के संपन्न कायस्थ परिवार में हुआ था। आरंभिक शिक्षा इंदौर में हुई जहां महादेवी जी के पिता शिक्षक थे। पिता ने पुत्री की प्रारंभिक शिक्षा हेतु घर पर ही शिक्षक की भी व्यवस्था कर रखी थी। नौ वर्ष की अल्प आयु में उनका विवाह कर दिया गया, किंतु बालिका महादेवी का विद्रोही मन संस्कारों से बोझिल दांपत्य जीवन की आरोपित व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर सका। उन्होंने पुनः क्रास्थवेट कॉलेज प्रयाग (1919 ईसवी) में अपना अध्यन आरंभ किया तथा मिडिल परीक्षा में पूरे प्रांत में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्होंने उच्च शिक्षा b.a. और m.a. प्रयाग विश्वविद्यालय से ग्रहण की।
ये गांधी जी से प्रेरणा ग्रहण करता आजीवन शिक्षा और समाज कल्याण के कार्यों में लगी रही। स्त्री शिक्षा और कल्याणार्थ उन्होंने अनेक कार्य किए जिसमें महिला विद्यापीठ प्रयाग की स्थापना कराना और स्वयं प्रधानाचार्य बाद में कुलपति 1960 ईसवी का पद पर कार्य किया। इलाहाबाद में अपनी सखी ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ की अध्यक्षता में प्रथम कवियित्री सम्मेलन कराया। महादेवी विश्ववाणी के ‘बुद्ध अंक’ का संपादन किया और साहित्यकार संसद की स्थापना भी की। उनकी संवेदना का विस्तार ‘नीरभरी दु:ख की बदली’ से गद्य मे रमा, लक्ष्मी, घीसा,भक्तिन, आदि सभी के आंखों में पलने वाले सपनों के सत्य का व्यापक साक्षात्कार करती है। उनकी इन्हीं सेवाओं के कारण उन्हें अनेक पुरस्कार सम्मान व उपाध्या प्रदान की गई। जैसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का प्रथम भारत भारती पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार (यामा और दीपशिखा पर 1983 ईसवी) पद्मभूषण और पद विभूषण अलंकरण डि लीट् की मानक उपाधियाँ। 11 सितंबर 1987 ईस्वी में महादेव जी का देहांत हो गया।
रचनाएं-महादेवी की काव्य यात्रा का आरंभ ब्रजभाषा में समस्या पूर्ति से होता है किंतु 1917 में खड़ी बोली में लिखने लगीं। उनकी प्रमुख रचनाएं इस प्रकार है-
काव्य रचनाएं-निहार, रश्मि, नीरजा, दीपशिखा, प्रथम आयाम, हिमालय, अग्निरेखा, यामा (प्रथम 4 संग्रहों से ली गई कविताओं का संकलन), संधिनी, परिक्रमा।
गद्य रचनाएं-इन की प्रमुख गद्य रचनाएं हैं- अतीत के चलचित्र, पथ के साथी, क्षणदा, साहित्यकार की आस्था, संकल्पिता, मेरा परिवार, चिंता के क्षण, स्मृति चित्र ।
काव्यगत विशेषताएं-छायावाद के चारों प्रमुख स्तंभों जैसे प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी वर्मा की प्रमुख काव्य प्रवृत्ति गीतात्मक है, फिर भी इन चारों की अपनी निजी विशेषताएं भी हैं। महादेवी जी में बौद्ध दर्शन की करुणा व्याप्त है। महादेवी का समूचा काव्य वेदनामय दुखों के आंसुओं से भरा हुआ है। यह उनका अपना व्यक्तिगत भी है और समाजिक भी है और सब मिलकर विश्व वेदना बन जाता है। उनकी कविता ‘सब आंखों के आंसू उजले सबके सपनों में सत्य पला’ का प्रत्यक्ष दर्शन कराती है। प्रकृति उनके कार्य में प्रायः उद्दीपन, अलंकार, प्रतीक और संकेत के रूप में चित्रित हुई है। इस प्रकार प्रणय, करुणा, वेदना, रहस्य, जागरण जैसे भाव से समृद्धि उनकी कविता को अभिव्यक्त करने वाली काव्य शैली की प्रमुख विशेषताएं हैं- चित्रमयी भाषा, प्रतीकात्मकता, लाक्षणिकता, नदात्मक्ता, नूतन अलंकारिता, संगीतात्मकता, नविन छंदबद्धता।
साहित्य में स्थान- महादेवी जी ने अपने जीवन द्वारा समाज सेविका एवं साहित्य सेविका की फाँक को मिटाने का प्रयास किया। न केवल कविता में स्त्री का भावात्मक इतिहास लिखा अपितु गद्य में विविध विधाओं द्वारा गरीब, दलित, चर्चित नारी, बच्चों, विधवाओं को प्रमुख वर्ण्य विषय बनाकर नवजागरण का प्रयास किया। श्रृंखला की कड़ियां, स्मृति की रेखाएं, चांद, का संपादन उनके विशिष्ट है। हिंदी साहित्य और भाषा के विकास में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

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