Munsi Premchand ka jeevan parichay प्रेमचंद का जीवन परिचय

By | September 25, 2016

जीवन परिचय-

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का जन्म एक गरीब कायस्थ घराने में काशी से चार मील दूर लमही नामक गांव में 31 जुलाई 1880 ईसवीं को हुआ था। इनके पिता अजायब राय डाक मुंशी थे। 7 साल की अवस्था में माता का और 14 वर्ष की अवस्था में पिता का देहांत हो गया। घर में यूं ही बहुत निर्धनता थी। पिता की मृत्यु के पश्चात इन के सिर पर कठिनाइयों का पहाड़ टूट पड़ा है। रोटी कमाने की चिंता बहुत जल्दी इन के सिर पर आ पड़ी। ट्यूशन करके इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। इनका विवाह कम उम्र में हो गया था जो इन के अनुरूप नहीं था। अतः शिवरानी देवी के साथ दूसरा विवाह किया। स्कूल मास्टर की नौकरी करते हुए उन्होंने बीए पास किया। स्कूल मास्टर के रास्ते पर चलते चलते सन 1921 में वह गोरखपुर में स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बन गए। जब गांधी जी ने सरकारी नौकरी से इस्तीफे का बिगुल बजाया तो उसे सुनकर प्रेमचंद ने भी तुरंत त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद कुछ दिनों तक इन्होंने कानपुर के मारवाड़ी स्कूल में अध्यापन किया फिर काशी विद्यापीठ में प्रधान अध्यापक नियुक्त हुए। इसके बाद अनेक पत्र पत्रिकाओं का संपादन करते हुए काशी में प्रेस खोला। सन 1934-35 में आपने ₹8000 वार्षिक वेतन पर मुंबई की एक फिल्म में नौकरी कर ली। जलोदर रोग के कारण 8 अक्टूबर 1936 ईसवीं को काशी में स्थित उनके गांव में इनका देहावसान हो गया।

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साहित्यिक परिचय-

प्रेमचंद जी में साहित्य सृजन की जन्मजात प्रतिभा विद्यमान। आरंभ में नवाब राय के नाम से उर्दू में कहानियां और उपन्यास लिखते थे। इनकी ‘सोजे वतन’ नामक क्रांतिकारी रचना ने स्वाधीनता संग्राम में ऐसी हलचल मचाई की अंग्रेज सरकार ने इनकी कृति जप्त कर ली। बाद में प्रेमचंद नाम रखकर हिंदी साहित्य की साधना की और लगभग एक दर्जन उपन्यास और 300 कहानियां लिखी। इसके अतिरिक्त उन्होंने माधुरी तथा मर्यादा पत्रिकाओं का संपादन किया तथा हंस एवं जागरण नामक पत्र का प्रकाशन किया। जनता की बात जनता की भाषा में कह कर तथा अपने कथा साहित्य के माध्यम से तत्कालीन निम्न एवं मध्यम वर्ग का सच्चा चित्र प्रस्तुत करके प्रेमचंद जी भारतीयों के हृदय में समा गए। सच्चे अर्थों में ‘कलम के सिपाही’ और जनता के दुख दर्द के गायक इस महान कथाकार को भारतीय साहित्य जगत में ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से विभूषित किया गया।

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रचनाएं-

प्रेमचंद जी की निम्नलिखित कृतियां उल्लेखनीय है-
उपन्यास कर्मभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमश्रम, वरदान, सेवासदन, रंगभूमि, गबन और गोदान ।
नाटक कर्बला, प्रेम की वेदी, संग्राम और रूठी रानी ।
जीवन चरित्र कलम, तलवार और त्याग दुर्गादास, महात्मा शेखसादी, और राम चर्चा ।
निबंध संग्रह कुछ विचार ।
संपादित गल्प रत्न और गल्प समुच्चय।
अनुदित अहंकार, सुखदास, आजाद-कथा, चांदी की डिबिया, टॉलस्टॉय की कहानियां और सृष्टि का आरंभ ।
कहानी संग्रह नवनिधि, ग्रामीण जीवन की कहानियां, प्रेरणा, कफन, प्रेम पचीसी, कुत्ते की कहानी, प्रेम प्रसून, प्रेम चतुर्थी, मनमोदक, मानसरोवर, समर-यात्रा, सप्त सरोज, अग्नि-समाधि, प्रेम गंगा और प्रेम-सुमन ।

भाषा शैली

प्रेमचंद जी की भाषा के दो रूप है एक रूप तो वह है जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता है और दूसरा रूप वह है जिसमें उर्दू, संस्कृत, हिंदी के व्यवहारिक शब्दों का प्रयोग किया गया है यह भाषा अधिक सजीव व्यावहारिक एवं प्रवाहमयी है। इनकी भाषा सहज, सरल, व्यवहारिक, प्रवाहपूर्ण, मुहावरेदार एवं प्रभावशाली है । प्रेमचंद विषय एवं भाव के अनुरूप शैली को परिवर्तित करने में दक्ष थे। इन्होंने अपने साहित्य में प्रमुख रूप से पांच सहेलियों का प्रयोग किया है ।
1. वर्णनात्मक
2. विवेचनात्मक
3. मनोवैज्ञानिक
4. हास्य व्यंग प्रधान शैली तथा
5. भावात्मक शैली

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