Naamdev ka jivan prichay नामदेव का जीवन परिचय

By | July 14, 2016

(जन्म – 1270 नरसी-बामनी, महाराष्ट्र; मृत्य- 1350 पंढरपुर, महाराष्ट्र) भारत के प्रमुख मध्यकालीन संत कवि, जिन्होंने मराठी भाषा में अपनी रचनाएँ लिखीं।
जीवन परिचय

नामदेव विवाहित थे और उनके पांच बच्चे थे। सन्त नामदेव बाल्यावस्था से ही दयालु और विट्ठल प्रेमी थे। इसके बाद नामदेव भक्ति की ओर मुड़ गए और वाराकरी[1] के प्रमुख प्रतिपादक बने।
काव्य रचना

वह संप्रदाय भक्ति[2] की अभिव्यक्ति एवं धार्मिक व्यवस्था में जाति बंधन से मुक्ति के लिए जाना गया। नामदेव ने कई अभंग[3] लिखे, जिनमें भगवान के प्रति उनके समर्पण की अभिव्यक्ति है। महाराष्ट्र और पंजाब में अत्यधिक लोकप्रिय उनके कुछ भजन सिक्खों की पवित्र पुस्तक आदि ग्रंथ में शामिल हैं। नामदेव ने भक्ति गीतों की परंपरा को प्रेरणा दी, जो महाराष्ट्र में चार सदी तक जारी तथा महान भक्त कवि तुकाराम की रचनाओं में पराकाष्ठा तक पहुंची।
संत नामदेव ने विसोबा खेचर को गुरु के रूप में स्वीकार किया था। ये संत ज्ञानेश्वर के समकालीन थे और उम्र में उनसे ५ साल बड़े थे। संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर के साथ पूरे महाराष्ट्र का भ्रमण किए, भक्ति-गीत रचे और जनता जनार्दन को समता और प्रभु-भक्ति का पाठ पढ़ाया। संत ज्ञानेश्वर के परलोकगमन के बाद इन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया। इन्होंने मराठी के साथ ही साथ हिन्दी में भी रचनाएँ लिखीं। इन्होंने अठारह वर्षो तक पंजाब में भगवन्नाम का प्रचार किया। अभी भी इनकी कुछ रचनाएँ सिक्खों की धार्मिक पुस्तकों में मिलती हैं। मुखबानी नामक पुस्तक में इनकी रचनाएँ संग्रहित हैं। आज भी इनके रचित गीत पूरे महाराष्ट्र में भक्ति और प्रेम के साथ गाए जाते हैं। ये संवत १४०७ में समाधि में लीन हो गए।

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नामदेव वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत हो गए हैं। इनके समय में नाथ और महानुभाव पंथों का महाराष्ट्र में प्रचार था। नाथ पंथ “अलख निरंजन” की योगपरक साधना का समर्थक तथा बाह्याडंबरों का विरोधी था और महानुभाव पंथ वैदिक कर्मकांड तथा बहुदेवोपासना का विरोधी होते हुए भी मूर्तिपूजा को सर्वथा निषिद्ध नहीं मानता था। इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र में पंढरपुर के “विठोबा” की उपासना भी प्रचलित थी। सामान्य जनता प्रति वर्ष आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी को उनके दर्शनों के लिए पंढरपुर की “वारी” (यात्रा) किया करती थी (यह प्रथा आज भी प्रचलित है) इस प्रकार की वारी (यात्रा) करनेवाले “वारकरी” कहलाते हैं। विट्ठलोपासना का यह “पंथ” “वारकरी” संप्रदाय कहलाता है। नामदेव इसी संप्रदाय के प्रमुख संत माने जाते हैं।बिसोवा खेचर से दीक्षा लेने के पूर्व तक ये सगुणोपासक थे। पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) की उपासना किया करते थे। दीक्षा के उपरांत इनकी विट्ठलभक्ति सर्वव्यापक हो गई। महाराष्ट्रीय संत परंपरा के अनुसार इनकी निर्गुण भक्ति थी, जिसमें सगुण निर्गुण का काई भेदभाव नहीं था। उन्होंने मराठी में कई सौ अभंग और हिंदी में सौ के लगभग पद रचे हैं। इनके पदों में हठयोग की कुंडलिनी-योग-साधना और प्रेमाभक्ति की (अपने “राम” से मिलने की) “तालाबेली” (विह्वलभावना) दोनों हैं। निर्गुणी कबीर के समान नामदेव में भी व्रत, तीर्थ आदि बाह्याडंबर के प्रति उपेक्षा तथा भगवन्नाम एवं सतगुरु के प्रति आदर भाव विद्यमान है। कबीर के पदों में यततत्र नामदेव की भावछाया दृष्टिगोचर होती है। कबीर के पूर्व नामदेव ने उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का प्रचार किया, जो निर्विवाद है।
जीवनचरित्र
नामदेव का जन्म शके 1192 में प्रथम संवत्सर कार्तिक शुक्ल एकादशी को नरसी ब्राह्मणी नामक ग्राम में दामा शेट शिंपी (दर्जी) के यहाँ हुआ था। इनका मन पैतृक व्यवसाय में कभी नहीं लगा। ये प्रारंभ में लूट मार, हत्या आदि समाजविरोधी कार्य किया करते थे। एक दिन जब ये अपने उपास्य आवढ्या के नागनाथ के दर्शन के लिए गए, इन्होंने मंदिर के पास एक स्त्री का अपने रोते हुए बच्चे को बुरी तरह से मारते हुए देखा। इन्होंने जब उससे उसका कारण पूछा, उसने बड़ी वेदना के साथ कहा, “इसके बाप को तो डाकू नामदेव ने मार डाला अब मैं कहाँ से इसके पेट में अन्न डालूँ”। नामदेव के मन पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा। ये विरक्त हो पंढरपुर में जाकर “विठोबा” के भक्त हा गए। वहीं इनकी ज्ञानेश्वर परिवार से भेंट हुई और उसी की प्रेरणा से इन्होंने नाथपंथी विसोबा खेचर से दीक्षा ली। जो नामदेव पंढरपुर के “विट्ठल” की प्रतिमा में ही भगवान को देखते थे, वे खेचर के संपर्क में आने के बाद उसे सर्वत्र अनुभव करने लगे। उसकी प्रेमभक्ति में ज्ञान का समावेश हा गया। डॉ॰ मोहनसिंह नामदेव को रामानंद का शिष्य बतलाते हैं। परंतु महाराष्ट्र में इनकी बहुमान्य गुरु परंपरा इस प्रकार है –

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ज्ञानेश्वर और नामदेव उत्तर भारत की साथ साथ यात्रा की थी। ज्ञानेश्वर मारवाड़ में कोलदर्जी नामक स्थान तक ही नामदेव के साथ गए। वहाँ से लौटकर उन्होंने आलंदी में शके 1218 में समाधि ले ली। ज्ञानेश्वर के वियोग से नामदेव का मन महाराष्ट्र से उचट गया और ये पंजाब की ओर चले गए। गुरुदासपुर जिले के घोभान नामक स्थान पर आज भी नामदेव जी का मंदिर विद्यमान है। वहाँ सीमित क्षेत्र में इनका “पंथ” भी चल रहा है। संतों के जीवन के साथ कतिपय चमत्कारी घटनाएँ जुड़ी रहती है। नामदेव के चरित्र में भी सुल्तान की आज्ञा से इनका मृत गाय को जिलाना, पूर्वाभिमुख आवढ्या नागनाथ मंदिर के सामने कीर्तन करने पर पुजारी के आपत्ति उठाने के उपरांत इनके पश्चिम की ओर जाते ही उसके द्वार का पश्चिमाभिमुख हो जाना, विट्ठल की मूर्ति का इनके हाथ दुग्धपान करना, आदि घटनाएँ समाविष्ट हैं। महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर शके 1272 में समाधि ले ली। कुछ विद्वान् इनका समाधिस्थान घोमान मानते हैं, परंतु बहुमत पंढरपुर के ही पक्ष में हैं।

5 thoughts on “Naamdev ka jivan prichay नामदेव का जीवन परिचय

  1. Nishant verma

    नामदेव जी के संबंध में अधूरा ज्ञान निराशाजनक है। नामदेव जी बचपन से ही विट्ठल भक्त रहे हैं यह बात सर्वविदित है, एेसे में उन्हें डाकू बताना हास्यास्पद है।

  2. Vishal Post author

    एडिट के बाद भी अगर कोई त्रुटी हो तो अवश्य बताएं.

  3. Vishal Post author

    हमे अपनी गलती के लिए पछतावा है. हमने लेखन में सुधार कर लिया है. उम्मीद है आपको अच्चा लगे.

  4. सन्तोष खाचरियावास

    सन्त शिरोमणि के बारे में भ्रामक जानकारी देना अत्यंत खेद का विषय है। सन्त नामदेव बाल्यावस्था से ही दयालु और विट्ठल प्रेमी थे। ऐसे में युवावस्था में उन्हें डाकू बताना मूर्खतापूर्ण और मनगढ़ंत है। पोर्टल से ऐसी सामग्री को तुरंत हटाना चाहिए।

  5. अशोक ए• गहलोत, बैंगलोर

    जिसने भी महान संत शिरोमणि श्री नामदेवजी के बारे में लिखा है उसे इतिहास की बिल्कुल भी जानकारी नहीं है। उनका पूरा जीवन श्री विट्ठल भगवान की सेवा में गुजरा। मसाले दार लेखन के ऐतिहासिक मूल्यों से छेडछाड नवीन पीढ़ी को गलत संदेश देती हैं। मैं लेखक की कडे शब्दों में भत्सर्ना करता हूँ। ऐसे पागल लोगों की जगह जेल होनी चाहिए। पोर्टल से इस गलत बात को तुरंत हटाया जाए।

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