Nagarjun ka jeevan parichay. नागार्जुन का जीवन परिचय

By | September 26, 2016

Nagarjun ka jeevan parichay-

श्री वैधनाथ मिश्र यानी नागार्जुन का जन्म दरभंगा जिले के सतलखा ग्राम में 30 जून 1911 में हुआ था। इनका आरंभिक जीवन अभाव का जीवन था। जीवन के अभाव ने ही आगे चल कर इनके संघर्षशील व्यक्तित्व का निर्माण किया। व्यक्तिगत दुख में इन्हें मानवता के दुख को समझने की क्षमता प्रदान की। इनके जीवन की यही रागिनी उनकी रचनाओं में मुखर हुई है। 5 नवंबर सन 1998 ईसवी को आप परलोक सिधार गए। उनके हृदय में सदैव दलित वर्ग के प्रति संवेदना रही है। उनकी कविताओं में यह अत्याचार पीड़ित ग्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके ही संतुष्ट नहीं हो गए बल्कि इनको अनीति और अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा भी दी। समसामयिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं पर इन्होंने काफी लिखा है। व्यंग करने में इन्हें संकोच नहीं दिखी और सीधी चोट करने वाले यह अपने समय के प्रमुख व्यंगकार थे।

रचनाएं-

उपन्यास रतिनाथ की चाची, बलचनमा, नई पौध, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन और वरुण के बेटे।
काव्य युगधारा, सतरंगे पंखोंवाली, प्यासी पथराई आंखे, फूल और शोल, हजार-हजार बाहोंवाली, तुमने कहा था ।
उनकी रचनाओं पर उत्तर प्रदेश का ‘भारत भारती’ मध्य प्रदेश का ‘कबीर’ तथा बिहार का ‘राजेंद्र प्रसाद’ सम्मान प्राप्त हुआ।
नागार्जुन जीवन के धरती के जनता के तथा श्रम के गीत गाने वाले कवि थे। उनकी कविताओं को किसी वाद की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की भांति उन्होंने अपनी कविता को भी स्वतंत्र रखा है।

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नागार्जुन जी किस शैली

नागार्जुन जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की अमिट छाप है। वह अपनी भाषा अपने ढंग से कहते हैं इसलिए उनकी काव्य-शैली किसी से मेल नहीं खाती। उनकी कविताएं प्रगति और प्रयोग के मणिकांचन सहयोग के कारण एक प्रकार से सहज भाव सन सुंदर से दीप्त हो उठी है। वह अपनी ओर से अपनी शैली में भाषा का ना तो श्रृंगार करते दिख पड़ते हैं और न ही रस परिपाक की योजना का अनुष्ठान करते हैं। उनके भाव स्वयं ही अपनी अभिव्यक्ति के अनुकूल अपनी भाषा के रूप निर्माण कर उसमें रस की प्रतिष्ठा कर लेते हैं। इसलिए उनकी सैलरी स्वभाविक और पाठकों के हृदय में तत्संबंधी भावनाओं को दीप्त करने वाली होती है। इन्होंने अधिकांश मुक्तक काव्य की ही रचना की है।

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भाषा

नागार्जुन जी की भाषा अधिकतर लोक भाषा के अधिक निकट है इसलिए उनकी भाषा सहज, सरल, बोद्धगम्य, स्पष्ट, स्वाभाविक और मार्मिक प्रभाव डालने वाली है। कुछ थोड़ी सी कविताओं में संस्कृत के तत्सम विसतंतु, मदिरारुण, उन्माद आदि शब्दों का प्रयोग अधिक मात्रा में अवश्य किया गया है। किंतु ऐसे शब्दों के प्रयोग से उनकी भावाभिव्यक्ति में बाधा नहीं पड़ती है। संस्कृत, पाली और प्राकृत भाषाओं के ज्ञाता हो कर भी उनमें पांडित्य प्रदर्शन की लालसा नहीं है। जिन कविताओं में संस्कृत की क्लिष्ठ तत्सम की अधिकता है उनमें भी पांडित्य प्रदर्शन के प्रति इनका आग्रह न होकर भावाभिव्यक्ति के अनुरूप भाषा की प्रतिष्ठा करने का स्वभाविक प्रयास है। उन्होंने अपनी भाषा में तद्भव तथा ग्रामीण शब्दों का भी यत्र तत्र प्रयोग किया है। किंतु ऐसे शब्द जिनकी उनकी भावाभिव्यक्ति में बाधक ना होकर उनमें एक विविध प्रकार की मिठास उत्पन्न करते हैं। कुछ कविताओं को छोड़कर उन्होंने अपनी शेष कविताओं में लोग मुख वाणी दी है। उनकी भाषा में ना तो शब्दों की तोड़ तोड़ मरोड़ है और न उन पर मैथिली का प्रभाव है।

One thought on “Nagarjun ka jeevan parichay. नागार्जुन का जीवन परिचय

  1. masroo zahid

    novelist like a social builder and gave path of life to

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