Ramchandra Shukla ka jivan prichay आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय

By | August 27, 2016

जीवन परिचय- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 में बस्ती जनपद के अगोना नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता श्री चन्द्रबली शुक्ल सरकारी कर्मचारी थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा राठ ( हमीरपुर) में हुई। इसके पश्चात इन्होंने मिर्जापुर से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद इनका नियमित नियमित विद्यालयीय शिक्षा का क्रम टूट गया।
मिर्जापुर के ही मिशन स्कुल में कला अध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। बाद में शुक्ल जी हिंदी शब्द सागर के संपादन में वैतनिक सहायक के रूप में बनारस आ गये। यहीं पर काशी नागरी प्रचारिणी सभा के विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए ख्याति प्राप्त की। आपने कुछ दिनों तक नागरी प्रचारिणी पत्रिका का संपादन भी किया। कोश का कार्य पूरा हो जाने के बाद आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यापक के रूप में नियुक्त हो गये। बाबू श्यामसुन्दर दास के अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ही हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष हो गये। सन् 1941 में हृदय गति रुकने से आपका देहावसान हो गया।

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साहित्यिक योगदान- बहुमुखी प्रतिभा के धनी शुक्ल जी को हिंदी साहित्य के उन्नायकों में अति विशिष्ठ स्थान प्राप्त है। आपने निबंधकार, समालोचक, संपादक, अनुवादक, कोशकार आदि विभिन्न रूपों में हिंदी-साहित्य को समृद्ध किया। आचार्य शुल्क को हिंदी के मनोवैज्ञानिक निबंध लेखन परम्परा का जनक माना जाता है। उन्होंने हिंदी-साहित्य में इतिहास लेखन की परम्परा की शुरुआत की। इस दृष्टि से उनका हिंदी-साहित्य का इतिहास आज भी विशिष्ठ स्थान है।

कृतियाँ- शुक्ल जी ने निबंध, शोध, इतिहास एवं समालोचना के क्षेत्र में त्रिस्तरीय ग्रंथों की रचना की। आपकी कृतियाँ का परिचय इस प्रकार है-
निबंध साहित्य- ‘चिंतामणि’ तथा ‘विचार वीथि’ आपके निबंध ग्रंथ हैं।
समालोचना साहित्य- ‘सूरदास’ , ‘गोस्वामी तुलसीदास’ , ‘त्रिवेणी’, ‘रस-मीमांसा’ ।
इतिहास ग्रन्थ- ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ ।
सम्पादित ग्रन्थ- जायसी, ग्रंथावली, हिंदी-शब्द-सागर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका।
भाषा- शुक्ल जी की भाषा पर पूर्णाधिकार था। उनकी भाषा विषयानुरूप परिवर्तित होती है। गंभीर एवं सहितियिक विषयों पर लिखते समय भाषा शब्द प्रधान नहीं है। व्यवहारिक विषयों पर लिखते समय उनका सरल स्वरूप सम्मुख आया है। भाषा का सुगठित होना, व्यर्थ का एक भी शब्द न आना तथा मुहावरों, लोकोक्तियों और सूक्तियों का प्रयोग आपके लेखन की विशेषता है।
शैली- शुक्ल जी की लेखन शैली के अनेक रूप है जो संक्षेप में इस प्रकार है –
1. समीक्षात्मक शैली- इसका प्रयोग प्रधान रूप से समालोचनात्मक निबंधों तथा ग्रंथों में हुआ है।
2. गवेषणात्मक शैली- शोध प्रधान विषयों पर लिखते समय इसका रुप सामने आया है।
3.विचारात्मक शैली- साहित्यिक विषयों पर लिखते समय इस शैली का उपयोग हुआ है ।
4. वर्णनात्मक शैली- वर्णन और विवरण के प्रसंग में शैली भी अपनाई गई है ।
5.सूक्ति परक शैली- शुक्ल जी की यह विशिष्ट शैली है। आप सूक्ति परक वाक्य का प्रयोग करके विषय को रोचकता तथा गंभीरता प्रदान करते हैं । यथा विश्वासपात्र मित्र जीवन की एक औषध है ।
6. हास्य व्यंगात्मक शैली- गंभीरता को कम करने के लिए शुक्ला जी ने बीच-बीच में हास्य व्यंग शैली का प्रयोग किया है।

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