Sindhu Sabhyta सिंधु सभ्यता

By | October 14, 2016

रेडियो कार्बन C14 जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा सिंधु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2400 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व मानी गई है।
सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की ।
सिंधु सभ्यता को प्रागैतिहासिक अथवा कांस्य युग में रखा जा सकता है ।इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ एवं भूमध्यसागरीय थे ।
सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पूरा स्थल ब्यास नदी के किनारे स्थित सुटकांगेंडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल हिंडन नदी के किनारे आलमगीरपुर (जिला में उत्तर प्रदेश ), उत्तरी पुरास्थल चिनाव नदी के तट पर अखनूर के निकट मांडा (जम्मू कश्मीर) तथा दक्षिणी पुरास्थल गोदावरी नदी के तट पर दायमाबाबा (जिला अहमदनगर महाराष्ट्र)।
सिंधु सभ्यता अथवा सैंधव सभ्यता भारतीय नगरीय सभ्यता थी। सैंधव संभ्यता से प्राप्त परिपक्व अवस्था वाले स्थलों में 6 को बड़े नगर की  की संज्ञा दी गई है। यह है मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गढ़वारीवाला, धौलावीरा एवं कालीबंगन।
स्वतंत्रता पश्चात हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गए हैं ।
लोथल एवं सुतकोतदा सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था ।
जूते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से  प्राप्त हुआ है।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार संभवतः सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत है।
अग्निकुंड लोथल एवं कालीबंगन से प्राप्त हुए हैं।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक शील पर तीन मुखवाले देवता (पशुपति नाथ) की मूर्ति मिली है। उनके चारों और हाथी, गेंडा, चीता एवं भैंसा विराजमान हैं।
मोहनजोदड़ो से नर्तकी की एक कांस्य मूर्ति मिली है हड़प्पा की मोहरों पर सबसे अधिक एक श्रृंगी पशु का अंकन मिलता है ।
मनके बनाने के कारखाने लोथल एवं चन्हूदड़ों में मिले हैं ।
सिंधु सभ्यता की लिपि भाव चित्रात्मक है यह लिपि दाएं से बाई ओर लिखी जाती थी। जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था तो पहली पंक्ति दाएं से बाएं ओर और दूसरी बाएं से दाएं ओर लिखी जाती थी।
  सिंधु सभ्यता के लोगों ने नगरों तथा घरों के विन्यास के लिए ग्रिड पद्धति अपनाई । घरों के दरवाजे और खिड़कियां सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे । केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।
सिंधु सभ्यता में मुख्य फसल थी गेहूं और जौ।
सैंधव वासी मिठास के लिए सहद का प्रयोग करते थे ।
रगपुर एवं लोथल से चावल के दाने मिले हैं जिनसे धान की खेती होने का प्रमाण मिलता है चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल से ही प्राप्त हुए हैं।
सूतकोतदा, कालीबंगन एवं लोथल से सेंधव कालीन घोड़े के अस्थि पंजर मिले हैं ।
तौल की इकाई संभवत 16 के अनुपात में थी।
सेंधव सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों एवं चार पहियों वाली रेलगाड़ी का भैंसा गाड़ी का उपयोग करते थे ।
मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा शब्द का अभिप्राय सिंधु सभ्यता से ही है ।
संभवता हड़प्पा संस्कृति का शासन वणिक वर्ग के हाथों में था ।
पिग्गट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानी कहा है।
सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर पूजा किया करते थे। वृक्ष पूजा एवं शिव पूजा के प्रचलन के साक्ष्य भी सिंधु सभ्यता से मिलते हैं ।
स्वास्तिक चिन्ह संभवता हड़प्पा सभ्यता की देन है। इस चिन्ह से सूर्य उपासना का अनुमान लगाया जाता है। सिंधु घाटी के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।
सिंधु सभ्यता में मातृ देवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी।
पशुओं में कूबड़ वाला सांड इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पूजनीय था ।
स्त्री मृणमूर्तियां (मिट्टी की मूर्तियां) अधिक मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सेंधव समाज मातृ सत्तात्मक था।
  सैंधव वासी सूती एवं ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे ।
मनोरंजन के लिए सेंधवा वासी मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़ और पासा खेलना आदि साधनों का प्रयोग करते थे।
सिंधु सभ्यता के लोग काले रंग से डिजाइन किए हुए लाल मिट्टी के बर्तन बनाते थे ।
सिंधु घाटी के लोग तलवार से परिचित नहीं थे।
कालीबंगन एकमात्र हड़प्पा कालीन स्थल था जिसका निचला शहर (सामान्य रोग लोगों के रहने हेतु) भी किले से घिरा हुआ था। कालीबंगन का अर्थ है काली चूड़ियां । यहां से पूर्व हड़प्पा स्तरों के खेत जोते जाने के और अग्नि पूजा की प्रथा के प्रमाण मिले हैं ।
पर्दा प्रथा एवं वेश्यावृत्ति सेंधव सभ्यता में प्रचलित थी ।
शव को जलाने एवं गाड़ने यानी दोनों प्रथाएं प्रचलित थी। हड़प्पा में शव को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विद्यमान थी।
  लोथल एवं कालीबंगा में युग्म समाधियाँ मिली है।
आग में पकी हुई मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता है।

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