Sumitra nandan pant ka jeevan parichay सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय

By | September 17, 2016

जीवन परिचय-पंत का जन्म वर्तमान उत्तरांचल के कुमाऊ अल्मोड़ा के निकट कौसानी नामक ग्राम में 20 मई 1900 को देवी दत्त पंत के घर हुआ था। माता की मृत्यु के पश्चात पिता तथा दादी के वात्सल्य की छाया में इनका लालन पालन हुआ। उनकी शिक्षा का पहला चरण अल्मोड़ा में हुआ यहीं पर उन्होंने अपना नाम गुस्साई दत्त से बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। 1919 ईसवीं में सुमित्रानंदन पंत अपने मंझले भाई के साथ बनारस चले आए यहां पर जय नारायण कॉलेज में और उच्च शिक्षा म्योर कॉलेज इलाहाबाद में शिक्षा प्राप्त की। 1950 ईस्वी में ये ‘ऑलइंडिया रेडियो’ से संबंध रहे। काशी में इनका परिचय सरोजिनी नायडू तथा रवींद्रनाथ ठाकुर के काव्य के साथ साथ अंग्रेजी की रोमांटिक कविता से हुआ और यहीं पर उन्होंने कविता प्रतियोगिता में भाग लेकर प्रशंसा प्राप्त की। संगीत से इनका विशेष प्रेम व लगाव था। प्रकृति के चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत का देहावसान 28 दिसंबर 1977 ईस्वी में हुआ।
रचनाएं- छायावादी युग के ख्यातिप्राप्त कवि सुमित्रानंदन पंत एक कवि होने के साथ-साथ विचारक भी थे। पंत 7 वर्ष की अल्प आयु से ही कविताओं की रचना करने लगे थे। इनकी प्रथम रचना 1976 ईस्वी में प्रकाश में आई। ‘गिरजे का घंटा’ नामक इस रचना के पश्चात में निरंतर काव्य साधना में तल्लीन रहे। 1920 ईस्वी में इनकी रचनाए ‘उच्छवास’ एवं ‘ग्रंथि’ प्रकाशित हुई। 1921 ईस्वी में इन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर कॉलेज छोड़ दिया और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में सम्मिलित हो गए परंतु अपनी कोमल प्रकृति के कारण सत्याग्रह में सक्रिय रुप से सहयोग नहीं कर पाए और सत्याग्रह छोड़कर पुनः काव्य साधना में संलग्न हो गए।
पंत जी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। अपने विस्तृत साहित्यिक जीवन में इन्होंने विविध विधाओं में रचनाएं की। इनकी प्रमुख कृतियां लोकायतन, वीणा, पल्लव, गुंजन, ग्रंथि, स्वर्णधूलि, स्वर्णकिरण, युगपत, उत्तरा, युगांत और युगवाणी आदि प्रमुख है।
काव्यगत विशेषताएं-पंत जी की अंतर्दृष्टि तथा संवेदनशीलता ने जहां उनके भावपक्ष को गहराई एवं विविधता प्रदान की है, वहीं उनकी कल्पना शक्ति और अभिव्यक्ति कौशल ने उनके कला पक्ष को संवारा है।
सुमित्रानंदन पंत के काव्य में कल्पना एवं भाव की सुकुमार कोमलता के दर्शन होते हैं। उनकी कविताएं अत्यंत एवं मृदु भावों की अभिव्यक्ति है, इन्ही कारण से सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। प्रकृति और सौंदर्य के सुकुमार कवि, छायावाद के प्रमुख स्तंभ, प्रगतिवाद के नायक, अरविंद दर्शन के व्याख्याता, और कोमल अनुभूतियों के संवेदनशील चितेरे सुमित्रानंदन पंत आधुनिक युग के महान कवियों की श्रृंखला में शीर्ष स्थान पर प्रतिष्ठित है। पंत का संपूर्ण काव्य आधुनिक साहित्यिक चेतना का प्रतीक है। इनके काव्य में भारतीय दर्शन, आध्यात्मिकता, नैतिकता, मौलिकता और भारतीय समाज के विभिन्न पक्षों का भी अद्भुत चित्र देखने को मिलता है। सुंदरता और कोमलता उनके दर्शन और दृष्टिकोण के ही नहीं वरन उनके व्यक्तित्व के भी अविकल अंग है।
पंत जी सौंदर्य के उपासक थे। उनकी सौंदर्य अनुभूति के तीन प्रमुख केंद्र रहे हैं- प्रकृति, नारी तथा कला सौंदर्य। उनके काव्य जीवन का प्रारंभ ही प्रकृति चित्रण से हुआ है। पंत जी की भाषा सरस सुकोमल खड़ी बोली है। भाव और विषय के अनुकूल मार्मिक शब्दावली उनकी लेखन से सहज प्रवाहित होती है।
पंत जी के काव्य में गीतात्मक मुक्तक शैली का प्रयोग देखने को मिलता है। प्रकृति के चित्रण में भावात्मक, आलंकारिक तथा दृश्य विधायक शैली का प्रयोग हुआ है। विचार प्रधान तथा दार्शनिक विषयों की शैली विचारात्मक निबंध विश्लेषणात्मक रूप में मिलती है।
पंत जी ने परंपरागत एवं नवीन दोनों ही प्रकार के अलंकारों का प्रयोग किया है। बिंबों की मौलिकता तथा उपमानों की मार्मिकता हृदयहारिणी है। कहीं सूचना की स्थूल से तथा कहीं स्थूल की सूक्ष्म वस्तुओं से उपमा देने में पंत अत्यंत निपुण है। पंत के काव्य में वर्णिक छंदों की अपेक्षा मात्रिक छंदों को अधिक महत्व दिया गया है। परंतु प्रगतिवाद होने पर भी पंत जी अलंकारों के समान छंदों के बंधन का भी विरोध करने लगे थे। परंपरागत छंदों के साथ-साथ नवीन छंदों की भी रचना की है। आपने गेयता और ध्वनि प्रभाव पर बल दिया है। मात्राओं और वर्णों के क्रम तथा संख्या पर नहीं।
साहित्य में स्थान-सुमित्रानंदन पंत जी असाधारण प्रतिभा से संपन्न साहित्यकार थे। काव्य के भाव एवं कलापक्ष इन दोनों ही क्षेत्रों में वह एक महान कवि थे। छायावाद के युग प्रवर्तक कवि के रूप में उन्हें अपार ख्याति प्राप्त हुई।

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