Surdas ka jeevan parichay. सूरदास का जीवन परिचय

By | October 22, 2016

Surdas ka jeevan parichay-

जीवन परिचय- सूरदास जी का जन्म 1478ई. (वैशाख शुक्ल पंचमी,सन् 1535विo) में आगरा -मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक ग्राम में हुआ था| कुछ विद्वान् दिल्ली के निकट’सीही’ ग्राम को भी इनका जन्म – स्थान मानते हैं| सूरदास जी जन्मान्ध थे, इस विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं| इन्होंने कृष्ण की बाल- लीलाओ का, मानव – स्वभाव का एव प्रकृति का ऐसा सजीव वर्णन किया है, जो आँखो से प्रत्यक्ष देखे बिना सम्भव नहीँ है| इन्होंने स्वयम् अपने आपको जन्मान्ध कहा है| ऐसा इन्होंने आत्मग्लानिवश, लाक्षणिक रूप में अथवा ज्ञान – चक्षुओं के अभाव के लिए भी कहा हो सकता है| सूरदास की रूचि बचपन से ही भगवद्भक्ति के गायन में थी| इनसे भक्ति का एक पद सुनकर पुष्टिमार्ग के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया और  श्रीनाथजी के मन्दिर में कीर्तन का भार सौप दिया| श्री वल्लभाचार्य के पुत्र बिठ्ठलनाथ ने, अष्टछाप , नाम से आठ कृष्णभक्त कवियों का जो सन्गठन किया था, सूरदास जी इसके सर्वश्रेष्ठ कवि थे| वे गऊघाट  पर रहकर जीवनपर्यन्त कृष्ण की लीलाओं का गायन करते रहे| सूरदास जी का गोलोकवसा ( मृत्यु) 1583ई. (सन् 1640 विo ) में गोसाई बिठ्ठलनाथ के सामने गोवर्ध्दन की तलहटी के पारसोली नामक ग्राम में हुआ| ‘खंजन नैन रूप रस माते’ पद का गान करते हुए इन्होंने अपने भौतिक शरीर का त्याग किया|

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कृतियाँ(रचनाएँ)- महाकवि सूरदास की निम्नलिखित तीन रचनाएँ ही उपलब्ध है

1.सूरसागर- श्रीमद्भागवत् के आधार पर रचित ‘सूरसागर’ कृष्ण की बाल-लीलाओं, गोपी-प्रेम,गोपी-विरह, उध्दव -गोपी संवाद का बड़ा मनोवैज्ञानिक और सरल वर्णन है|

2.सुर- सारावली- इसमें 1107 पद हैं| यह ‘सूरसागर’ का सारभाग है|

3.साहित्य-लहरी- इसमें 118 दृष्टकूट पदों का संग्रह है |

साहित्य में स्थान- भक्त कवि सूरदास का स्थान हिंदी- साहित्याकाश में सूर्य के समान ही है | इसीलिए कहा गया है

सुर सुर तुलसी ससी,उडुगन केशवदास|

अब के कवि खघोत सम , जहँ तहँ करत           प्रकास||

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