Tulsi Das ka jivan prichay तुलसीदास का जीवन परिचय

By | July 14, 2016

तुलसीदास : परिचय
जन्म काल

महान कवि तुलसीदास की प्रतिभा-किरणों से न केवल हिन्दू समाज और भारत, बल्कि समस्त संसार आलोकित हो रहा है। बड़ा अफसोस है कि उसी कवि का जन्म-काल विवादों के अंधकार में पड़ा हुआ है। अब तक प्राप्त शोध-निष्कर्ष भी हमें निश्चितता प्रदान करने में असमर्थ दिखाई देते हैं। मूलगोसाईं-चरित के तथ्यों के आधार पर डा० पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल और श्यामसुंदर दास तथा किसी जनश्रुति के आधार पर “मानसमयंक’ – कार भी १५५४ का ही समर्थन करते हैं। इसके पक्ष में मूल गोसाईं-चरित की निम्नांकित पंक्तियों का विशेष उल्लेख किया जाता है।

पंद्रह सै चौवन विषै, कालिंदी के तीर,
सावन सुक्ला सत्तमी, तुलसी धरेउ शरीर ।

तुलसीदास की जन्मभूमि
तुलसीदास की जन्मभूमि होने का गौरव पाने के लिए अब तक राजापुर (बांदा), सोरों (एटा), हाजीपुर (चित्रकूट के निकट), तथा तारी की ओर से प्रयास किए गए हैं। संत तुलसी साहिब के आत्मोल्लेखों, राजापुर के सरयूपारीण ब्राह्मणों को प्राप्त “मुआफी’ आदि बहिर्साक्ष्यों और अयोध्याकांड (मानस) के तायस प्रसंग, भगवान राम के वन गमन के क्रम में यमुना नदी से आगे बढ़ने पर व्यक्त कवि का भावावेश आदि अंतर्साक्ष्यों तथा तुलसी-साहित्य की भाषिक वृत्तियों के आधार पर रामबहोरे शुक्ल राजापुर को तुलसी की जन्मभूमि होना प्रमाणित हुआ है।
रामनरेश त्रिपाठी का निष्कर्ष है कि तुलसीदास का जन्म स्थान सोरों ही है। सोरों में तुलसीदास के स्थान का अवशेष, तुलसीदास के भाई नंददास के उत्तराधिकारी नरसिंह जी का मंदिर और वहां उनके उत्तराधिकारियों की विद्यमानता से त्रिपाठी और गुप्त जी के मत को परिपुष्ट करते हैं।

जाति एवं वंश
जाति और वंश के सम्बन्ध में तुलसीदास ने कुछ स्पष्ट नहीं लिखा है। कवितावली एवं विनयपत्रिका में कुछ पंक्तियां मिलती हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि वे ब्राह्मण कुलोत्पन्न थे-
दियो सुकुल जनम सरीर सुदर हेतु जो फल चारि को
जो पाइ पंडित परम पद पावत पुरारि मुरारि को ।
(विनयपत्रिका)
भागीरथी जलपान करौं अरु नाम द्वेै राम के लेत नितै हों ।
मोको न लेनो न देनो कछु कलि भूलि न रावरी और चितैहौ ।।जानि के जोर करौं परिनाम तुम्हैं पछितैहौं पै मैं न भितैहैं
बाह्मण ज्यों उंगिल्यो उरगारि हौं त्यों ही तिहारे हिए न हितै हौं।
जाति-पांति का प्रश्न उठने पर वह चिढ़ गये हैं। कवितावली की निम्नांकित पंक्तियों में उनके अंतर का आक्रोश व्यक्त हुआ है –
“”धूत कहौ अवधूत कहौ रजपूत कहौ जोलहा कहौ कोऊ काहू की बेटी सों बेटा न व्याहब,
काहू की जाति बिगारी न सोऊ।”
“”मेरे जाति-पांति न चहौं काहू का जाति-पांति,
मेरे कोऊ काम को न मैं काहू के काम को ।”
राजापुर से प्राप्त तथ्यों के अनुसार भी वे सरयूपारीण थे। तुलसी साहिब के आत्मोल्लेख एवं मिश्र बंधुओं के अनुसार वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। जबकि सोरों से प्राप्त तथ्य उन्हें सना ब्राह्मण प्रमाणित करते है, लेकिन “दियो सुकुल जनम सरीर सुंदर हेतु जो फल चारि को’ के आधार पर उन्हें शुक्ल ब्राह्मण कहा जाता है। परंतु शिवसिंह “सरोज’ के अनुसार सरबरिया ब्राह्मण थे।ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने के कारण कवि ने अपने विषय में “जायो कुल मंगन’ लिखा है। तुलसीदास का जन्म अर्थहीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जिसके पास जीविका का कोई ठोस आधार और साधन नहीं था। माता-पिता की स्नेहिल छाया भी सर पर से उठ जाने के बाद भिक्षाटन के लिए उन्हें विवश होना पड़ा।

माता–पिता
तुलसीदास के माता पिता के संबंध में कोई ठोस जानकारी नहीं है। प्राप्त सामग्रियों और प्रमाणों के अनुसार उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था। किन्तु भविष्यपुराण में उनके पिता का नाम श्रीधर बताया गया है। रहीम के दोहे के आधार पर माता का नाम हुलसी बताया जाता है।
सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय ।
गोद लिए हुलसी फिरैं, तुलसी सों सुत होय ।।

गुरु
तुलसीदास के गुरु के रुप में कई व्यक्तियों के नाम लिए जाते हैं। भविष्यपुराण के अनुसार राघवानंद, विलसन के अनुसार जगन्नाथ दास, सोरों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार नरसिंह चौधरी तथा ग्रियर्सन एवं अंतर्साक्ष्य के अनुसार नरहरि तुलसीदास के गुरु थे। राघवनंद के एवं जगन्नाथ दास गुरु होने की असंभवता सिद्ध हो चुकी है। वैष्णव संप्रदाय की किसी उपलब्ध सूची के आधार पर ग्रियर्सन द्वारा दी गई सूची में, जिसका उल्लेख राघवनंद तुलसीदास से आठ पीढ़ी पहले ही पड़ते हैं। ऐसी परिस्थिति में राघवानंद को तुलसीदास का गुरु नहीं माना जा सकता।
सोरों से प्राप्त सामग्रियों के अनुसार नरसिंह चौधरी तुलसीदास के गुरु थे। सोरों में नरसिंह जी के मंदिर तथा उनके वंशजों की विद्यमानता से यह पक्ष संपुष्ट हैं। लेकिन महात्मा बेनी माधव दास के “मूल गोसाईं-चरित’ के अनुसार हमारे कवि के गुरु का नाम नरहरि है।

बाल्यकाल और आर्थिक स्थिति
तुलसीदास के जीवन पर प्रकाश डालने वाले बहिर्साक्ष्यों से उनके माता-पिता की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर प्रकाश नहीं पड़ता। केवल “मूल गोसाईं-चरित’ की एक घटना से उनकी चिंत्य आर्थिक स्थिति पर क्षीण प्रकाश पड़ता है। उनका यज्ञोपवीत कुछ ब्राह्मणों ने सरयू के तट पर कर दिया था। उस उल्लेख से यह प्रतीत होता है कि किसी सामाजिक और जातीय विवशता या कर्तव्य-बोध से प्रेरित होकर बालक तुलसी का उपनयन
जाति वालों ने कर दिया था।
तुलसीदास का बाल्यकाल घोर अर्थ-दारिद्रय में बीता। भिक्षोपजीवी परिवार में उत्पन्न होने के कारण बालक तुलसीदास को भी वही साधन अंगीकृत करना पड़ा। कठिन अर्थ-संकट से गुजरते हुए परिवार में नये सदस्यों का आगमन हर्षजनक नहीं माना गया –
जायो कुल मंगन बधावनो बजायो सुनि,
भयो परिताप पाय जननी जनक को ।
बारें ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन,
जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को ।
(कवितावली)
मातु पिता जग जाय तज्यो विधि हू न लिखी कछु भाल भलाई ।
नीच निरादर भाजन कादर कूकर टूकनि लागि ललाई ।
राम सुभाउ सुन्यो तुलसी प्रभु, सो कह्यो बारक पेट खलाई ।
स्वारथ को परमारथ को रघुनाथ सो साहब खोरि न लाई ।।
होश संभालने के पुर्व ही जिसके सर पर से माता – पिता के वात्सल्य और संरक्षण की छाया सदा -सर्वदा के लिए हट गयी, होश संभालते ही जिसे एक मुट्ठी अन्न के लिए द्वार-द्वार विललाने को बाध्य होना पड़ा, संकट-काल उपस्थित देखकर जिसके स्वजन-परिजन दर किनार हो गए, चार मुट्ठी चने भी जिसके लिए जीवन के चरम प्राप्य (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) बन गए, वह कैसे समझे कि विधाता ने उसके भाल में भी भलाई के कुछ शब्द लिखे हैं। उक्त पदों में व्यंजित वेदना का सही अनुभव तो उसे ही हो सकता है, जिसे उस दारुण परिस्थिति से गुजरना पड़ा हो। ऐसा ही एक पद विनयपत्रिका में भी मिलता है –
द्वार-द्वार दीनता कही काढि रद परिपा हूं
हे दयालु, दुनी दस दिसा दुख-दोस-दलन-छम कियो संभाषन का हूं ।
तनु जन्यो कुटिल कोट ज्यों तज्यों मातु-पिता हूं ।
काहे को रोष-दोष काहि धौं मेरे ही अभाग मो सी सकुचत छुइ सब छाहूं ।
(विनयपत्रिका, २७५)

तुलसीदास के जीवन की कुछ घटनाएं एवं तिथियां भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। कवि के जीवन-वृत्त और महिमामय व्यक्तित्व पर उनसे प्रकाश पड़ता है।
यज्ञोपवीत
मूल गोसाईं चरित के अनुसार तुलसीदास का यज्ञोपवीत माघ शुक्ला पंचमी सं० १५६१ में हुआ –
पन्द्रह सै इकसठ माघसुदी। तिथि पंचमि औ भृगुवार उदी ।
सरजू तट विप्रन जग्य किए। द्विज बालक कहं उपबीत किए ।।
कवि के माता – पिता की मृत्यु कवि के बाल्यकाल में ही हो गई थी।

विवाह
जनश्रुतियों एवं रामायणियों के विश्वास के अनुसार तुलसीदास विरक्त होने के पूर्व भी कथा-वाचन करते थे। युवक कथावाचक की विलक्षण प्रतिभा और दिव्य भगवद्भक्ति से प्रभावित होकर रत्नावली के पिता पं० दीन बंधु पाठक ने एक दिन, कथा के अन्त में, श्रोताओं के विदा हो जाने पर, अपनी बारह वर्षीया कन्या उसके चरणों में सौंप दी। मूल गोसाईं चरित के अनुसार रत्नावली के साथ युवक तुलसी का यह वैवाहिक सूत्र सं० १५८३ की ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी, दिन गुरुवार को जुड़ा था –
पंद्रह सै पार तिरासी विषै ।
सुभ जेठ सुदी गुरु तेरसि पै ।
अधिराति लगै जु फिरै भंवरी ।
दुलहा दुलही की परी पंवरी ।।

आराध्य–दर्शन
भक्त शिरोमणि तुलसीदास को अपने आराध्य के दर्शन भी हुए थे। उनके जीवन के वे सर्वोत्तम और महत्तम क्षण रहे होंगे। लोक-श्रुतियों के अनुसार तुलसीदास को आराध्य के दर्शन चित्रकूट में हुए थे। आराध्य युगल राम – लक्ष्मण को उन्होंने तिलक भी लगाया था –
चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर ।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर ।।
मूल गोसाईं चरित के अनुसार कवि के जीवन की वह पवित्रतम तिथि माघ अमावस्या (बुधवार), सं० १६०७ को बताया गया है।
सुखद अमावस मौनिया, बुध सोरह सै सात ।
जा बैठे तिसु घाट पै, विरही होतहि प्रात ।।
गोस्वामी तुलसीदास के महिमान्वित व्यक्तित्व और गरिमान्वित साधना को ज्योतित करने वाली एक और घटना का उल्लेख मूल गोसाईं चरित में किया गया है। तुलसीदास नंददास से मिलने बृंदावन पहुंचे। नंददास उन्हें कृष्ण मंदिर में ले गए। तुलसीदास अपने आराध्य के अनन्य भक्त थे। तुलसीदास राम और कृष्ण की तात्त्विक एकता स्वीकार करते हुए भी राम-रुप श्यामघन पर मोहित होने वाले चातक थे। अतः घनश्याम कृष्ण के समक्ष नतमस्तक कैसे होते। उनका भाव-विभोर कवि का कण्ठ मुखर हो उठा –
कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान लो हाथ ।।
इतिहास साक्षी दे या नहीं द, किन्तु लोक-श्रुति साक्षी देती है कि कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति में बदल गई थी।

रत्नावली का महाप्रस्थान
रत्नावली का बैकुंठगमन ‘मूल गोसाईं चरित’ के अनुसार सं० १५८९ में हुआ। किंतु राजापुर की सामग्रियों से उसके दीर्घ जीवन का समर्थन होता है।

मीराबाई का पत्र
महात्मा बेनी माधव दास ने मूल गोसाईं चरित में मीराबाई और तुलसीदास के पत्राचार का उल्लेख किया किया है। अपने परिवार वालों से तंग आकर मीराबाई ने तुलसीदास को पत्र लिखा। मीराबाई पत्र के द्वारा तुलसीदास से दीक्षा ग्रहण करनी चाही थी। मीरा के पत्र के उत्तर में विनयपत्रिका का निम्नांकित पद की रचना की गई।
जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।
सो छोड़िये
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी ।
बलिगुरु तज्यो कंत ब्रजबनितन्हि, भये मुद मंगलकारी ।
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहां लौं ।
अंजन कहां आंखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहां लौं ।
तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों हाय सनेह राम-पद, एतोमतो हमारो ।।
तुलसीदास ने मीराबाई को भक्ति-पथ के बाधकों के परित्याग का परामर्श दिया था।

केशवदास से संबद्ध घटना
मूल गोसाईं चरित के अनुसार केशवदास गोस्वामी तुलसीदास से मिलने काशी आए थे। उचित सम्मान न पा सकने के कारण वे लौट गए।

अकबर के दरबार में बंदी बनाया जाना
तुलसीदास की ख्याति से अभिभूत होकर अकबर ने तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाया और कोई चमत्कार प्रदर्शित करने को कहा। यह प्रदर्शन-प्रियता तुलसीदास की प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रतिकूल थी, अतः ऐसा करने से उन्होंने इनकार कर दिया। इस पर अकबर ने उन्हें बंदी बना लिया। तदुपरांत राजधानी और राजमहल में बंदरों का अभूतपूर्व एवं अद्भुत उपद्रव शुरु हो गया। अकबर को बताया गया कि यह हनुमान जी का क्रोध है। अकबर को विवश होकर तुलसीदास को मुक्त कर देना पड़ा।

जहांगीर को तुलसी–दर्शन
जिस समय वे अनेक विरोधों का सामना कर सफलताओं और उपलब्धियों के सर्वोच्च शिखर का स्पर्श कर रहे थे, उसी समय दर्शनार्थ जहांगीर के आने का उल्लेख किया गया मिलता है।

दांपत्य जीवन
सुखद दांपत्य जीवन का आधार अर्थ प्राचुर्य नहीं, पति -पत्नि का पारस्परिक प्रेम, विश्वास और सहयोग होता है। तुलसीदास का दांपत्य जीवन आर्थिक विपन्नता के बावजूद संतुष्ट और सुखी था। भक्तमाल के प्रियादास की टीका से पता चलता है कि जीवन के वसंत काल में तुलसी पत्नी के प्रेम में सराबोर थे। पत्नी का वियोग उनके लिए असह्य था। उनकी पत्नी-निष्ठा दिव्यता को उल्लंघित कर वासना और आसक्ति की ओर उन्मुख हो गई थी।
रत्नावली के मायके चले जाने पर शव के सहारे नदी को पार करना और सपं के सहारे दीवाल को लांघकर अपने पत्नी के निकट पहुंचना। पत्नी की फटकार ने भोगी को जोगी, आसक्त को अनासक्त, गृहस्थ को सन्यासी और भांग को भी तुलसीदल बना दिया। वासना और आसक्ति के चरम सीमा पर आते ही उन्हें दूसरा लोक दिखाई पड़ने लगा। इसी लोक में उन्हें मानस और विनयपत्रिका जैसी उत्कृष्टतम रचनाओं की प्रेरणा और सिसृक्षा मिली।

वैराग्य की प्रेरणा
तुलसीदास के वैराग्य ग्रहण करने के दो कारण हो सकते हैं। प्रथम, अतिशय आसक्ति और वासना की प्रतिक्रिया ओर दूसरा, आर्थिक विपन्नता। पत्नी की फटकार ने उनके मन के समस्त विकारों को दूर कर दिया। दूसरे कारण विनयपत्रिका के निम्नांकित पदांशों से प्रतीत होता है कि आर्थिक संकटों से परेशान तुलसीदास को देखकर सन्तों ने भगवान राम की शरण में जाने का परामर्श दिया –
दुखित देखि संतन कह्यो, सोचै जनि मन मोहूं
तो से पसु पातकी परिहरे न सरन गए रघुबर ओर निबाहूं ।।तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीति-प्रतीति विनाहू ।
नाम की महिमा, सीलनाथ को, मेरो भलो बिलोकि, अबतें ।।
रत्नावली ने भी कहा था कि इस अस्थि – चर्ममय देह में जैसी प्रीति है, ऐसी ही प्रीति अगर भगवान राम में होती तो भव-भीति मिट जाती। इसीलिए वैराग्य की मूल प्रेरणा भगवदाराधन ही है।

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तुलसी का निवास – स्थान
विरक्त हो जाने के उपरांत तुलसीदास ने काशी को अपना मूल निवास-स्थान बनाया। वाराणसी के तुलसीघाट, घाट पर स्थित तुलसीदास द्वारा स्थापित अखाड़ा, मानस और विनयपत्रिका के प्रणयन-कक्ष, तुलसीदास द्वारा प्रयुक्त होने वाली नाव के शेषांग, मानस की १७०४ ई० की पांडुलिपि, तुलसीदास की चरण-पादुकाएं आदि से पता चलता है कि तुलसीदास के जीवन का सर्वाधिक समय यहीं बीता। काशी के बाद कदाचित् सबसे अधिक दिनों तक अपने आराध्य की जन्मभूमि अयोध्या में रहे। मानस के कुछ अंश का अयोध्या में रचा जाना इस तथ्य का पुष्कल प्रमाण है।
तीर्थाटन के क्रम में वे प्रयाग, चित्रकूट, हरिद्वार आदि भी गए। बालकांड के “”दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि-भरि कांवर चले कहारा” तथा “सूखत धान परा जनु पानी” से उनका मिथिला-प्रवास भी सिद्ध होता है। धान की खेती के लिए भी मिथिला ही प्राचीन काल से प्रसिद्ध रही है। धान और पानी का संबंध-ज्ञान बिना मिथिला में रहे तुलसीदास कदाचित् व्यक्त नहीं करते। इससे भी साबित होता है कि वे मिथिला में रहे।

विरोध और सम्मान
जनश्रुतियों और अनेक ग्रंथों से पता चलता है कि तुलसीदास को काशी के कुछ अनुदार पंडितों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा था। उन पंडितों ने रामचरितमानस की पांडुलिपि को नष्ट करने और हमारे कवि के जीवन पर संकट ढालने के भी प्रयास किए थे। जनश्रुतियों से यह भी पता चलता है कि रामचरितमानस की विमलता और उदात्तता के लिए विश्वनाथ जी के मन्दिर में उसकी पांडुलिपि रखी गई थी और भगवान विश्वनाथ का समर्थन मानस को मिला था। अन्ततः, विरोधियों को तुलसी के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। विरोधों का शमन होते ही कवि का सम्मान दिव्य-गंध की तरह बढ़ने और फैलने लगा। कवि के बढ़ते हुए सम्मान का साक्ष्य कवितावली की निम्नांकित पंक्तियां भी देती हैं –
जाति के सुजाति के कुजाति के पेटागिबस
खाए टूक सबके विदित बात दुनी सो ।
मानस वचनकाय किए पाप सति भाय
राम को कहाय दास दगाबाज पुनी सो ।राम नाम को प्रभाउ पाउ महिमा प्रताप
तुलसी से जग मानियत महामुनी सो ।
अति ही अभागो अनुरागत न राम पद
मूढ़ एतो बढ़ो अचरज देखि सुनी सो ।।
(कवितावली, उत्तर, ७२)
तुलसी अपने जीवन-काल में ही वाल्मीकि के अवतार माने जाने लगे थे –
त्रेता काव्य निबंध करिव सत कोटि रमायन ।
इक अच्छर उच्चरे ब्रह्महत्यादि परायन ।।पुनि भक्तन सुख देन बहुरि लीला विस्तारी ।
राम चरण रस मत्त रहत अहनिसि व्रतधारी ।
संसार अपार के पार को सगुन रुप नौका लिए ।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित बालमीकि तुलसी भए ।।
(भक्तमाल, छप्पय १२९)
पं० रामनरेश त्रिपाठी ने काशी के सुप्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक श्री मधुसूदन सरस्वती को तुलसीदास का समसामयिक बताया है। उनके साथ उनके वादविवाद का उल्लेख किया है और मानस तथा तुलसी की प्रशंसा में लिखा उनका श्लोक भी उद्घृत किया है। उस श्लोक से भी तुलसीदास की प्रशस्ति का पता मालूम होता है।
आनन्दकाननेह्यस्मिन् जंगमस्तुलसीतरु:
कविता मंजरी यस्य, राम-भ्रमर भूषिता ।

जीवन की सांध्य वेला
तुलसीदास को जीवन की सांध्य वेला में अतिशय शारीरिक कष्ट हुआ था। तुलसीदास बाहु की पीड़ा से व्यथित हो उठे तो असहाय बालक की भांति आराध्य को पुकारने लगे थे।
घेरि लियो रोगनि कुजोगनि कुलोगनि ज्यौं,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पोर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष, धूम-मूलमलिनाई है ।।करुनानिधान हनुमान महा बलबान,
हेरि हैसि हांकि फूंकि फौजें तै उड़ाई है ।
खाए हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।
(हनुमान बाहुक, ३५)
निम्नांकित पद से तीव्र पीड़ारुभूति और उसके कारण शरीर की दुर्दशा का पता चलता हैं –
पायेंपीर पेटपीर बांहपीर मुंहपीर
जर्जर सकल सरी पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारे हीं तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुंभज के निकट बिकल बूड़े गोखुरनि,
हाय राम रा ऐरती हाल कहुं भई है ।।
दोहावली के तीन दोहों में बाहु-पीड़ा की अनुभूति –
तुलसी तनु सर सुखजलज, भुजरुज गज बर जोर ।
दलत दयानिधि देखिए, कपिकेसरी किसोर ।।
भुज तरु कोटर रोग अहि, बरबस कियो प्रबेस ।
बिहगराज बाहन तुरत, काढिअ मिटे कलेस ।।
बाहु विटप सुख विहंग थलु, लगी कुपीर कुआगि ।
राम कृपा जल सींचिए, बेगि दीन हित लागि ।।
आजीवन काशी में भगवान विश्वनाथ का राम कथा का सुधापान कराते-कराते असी गंग के तीर पर सं० १६८० की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन तुलसीदास पांच भौतिक शरीर का परित्याग कर शाश्वत यशःशरीर में प्रवेश कर गए।
तुलसीदास की रचनाएँ
अपने दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास ने कालक्रमानुसार निम्नलिखित काल जयी ग्रन्थों की रचनाएं कीं – रामललानहछू, वैराग्यसंदीपनी, रामाज्ञाप्रश्न, जानकी-मंगल, रामचरितमानस, सतसई, पार्वती-मंगल, गीतावली, विनय-पत्रिका, कृष्ण-गीतावली, बरवै रामायण, दोहावली और कवितावली (बाहुक सहित)। इनमें से रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली जैसी कृतियों के विषय में यह आर्षवाणी सही घटित होती है – “”पश्य देवस्य काव्यं, न ममार न जीर्यति।
गोस्वामी तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाएंलगभग चार सौ वर्ष पूर्व गोस्वामी जी ने अपने काव्यों की रचना की। आधुनिक प्रकाशन-सुविधाओं से रहित उस काल में भी तुलसीदास का काव्य जन-जन तक पहुंच चुका था। यह उनके कवि रुप में लोकप्रिय होने का प्रमाण है। मानस के समान दीर्घकाय ग्रंथ को कंठाग्र करके सामान्य पढ़े लिखे लोग भी अपनी शुचिता एवं ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हो जाने लगे थे।
रामचरितमानस गोस्वामी जी का सर्वाति लोकप्रिय ग्रंथ रहा है। तुलसीदास ने अपनी रचनाओं के सम्बन्ध में कही उल्लेख नहीं किया है, इसलिए प्रामाणिक रचनाओं के संबंध में अंतस्साक्ष्य का अभाव दिखाई देता है। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ग्रंथ इसप्रकार हैं :
१ रामचरितमानस
२ रामललानहछू
३ वैराग्य-संदीपनी
४ बरवै रामायण
५ पार्वती-मंगल
६ जानकी-मंगल
७ रामाज्ञाप्रश्न
८ दोहावली
९ कवितावली
१० गीतावली
११ श्रीकृष्ण-गीतावली
१२ विनयपत्रिका
१३ सतसई
१४ छंदावली रामायण
१५ कुंडलिया रामायण
१६ राम शलाका
१७ संकट मोचन
१८ करखा रामायण
१९ रोला रामायण
२० झूलना
२१ छप्पय रामायण
२२ कवित्त रामायण
२३ कलिधर्माधर्म निरुपण
एनसाइक्लोपीडिया आफ रिलीजन एंड एथिक्स में ग्रियसन महोदय ने भी उपरोक्त प्रथम बारह ग्रंथों का उल्लेख किया है।

युग निर्माता तुलसीदास
गोस्वामी तुलसीदास न केवल हिन्दी के वरन् उत्तर भारत के सर्वश्रेष्ठ कवि एवं विचारक माने जा सकते हैं। महाकवि अपने युग का ज्ञापक एवं निर्माता होता है। इस कथन की पुष्टि गोस्वामी जी की रचनाओं से सवा सोलह आने होती है। जहां संसार के अन्य कवियों ने साधु-महात्माओं के सिद्धांतों पर आसीन होकर अपनी कठोर साधना या तीक्ष्ण अनुभूति तथा घोर धार्मिक कट्टरता या सांप्रदायिक असहिष्णुता से भरे बिखरे छंद कहे हैं और अखंड ज्योति की कौंध में कुछ रहस्यमय, धुंधली और अस्फुट रेखाएं अंकित की हैं अथवा लोक-मर्मज्ञ की हैसियत से सांसारिक जीवन के तप्त या शीतल एकांत चित्र खींचे हैं, जो धर्म एवं अध्यात्म से सर्वथा उदासीन दिखाई देते हैं, वहीं गोस्वामीजी ही ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इन सभी के नानाविध भावों को एक सूत्र में गुफित करके अपना अनुपमेय साहित्यिक उपहार प्रदान किया है।काव्य प्रतिभा के विकास-क्रम के आधार पर उनकी कृतियों का वर्गीकरण इसप्रकार हो सकता है – प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी और तृतीय श्रेणी। प्रथम श्रेणी में उनके काव्य-जीवन के प्रभातकाल की वे कृतियां आती हैं जिनमें एक साधारण नवयुवक की रसिकता, सामान्य काव्यरीति का परिचय, सामान्य सांसारिक अनुभव, सामान्य सहृदयता तथा गंभीर आध्यात्मिक विचारों का अभाव मिलता है। इनमें वर्ण्य विषय के साथ अपना तादात्म्य करके स्वानुभूतिमय वर्णन करने की प्रवृत्ति अवश्य वर्तमान है, इसी से प्रारंभिक रचनाएं भी इनके महाकवि होने का आभास देती हैं। इस श्रेणी में रामललानहछू, वैराग्यसंदीपनी, रामाज्ञा-प्रश्न और जानकी-मंगल परिगणनीय हैं।
दूसरी श्रेणी में उन कृतियों को समझना चाहिए जिनमें कवि की लोक-व्यापिनी बुद्धि, उसकी सद्ग्राहिता, उसकी काव्य के सूक्ष्म स्वरुप की पहचान, व्यापक सहृदयता, अनन्य भक्ति और उसके गूढ़ आध्यात्मिक विचार विद्यमान है। इस श्रेणी की कृतियों को हम तुलसी के प्रौढ़ और परिप काव्य-काल की रचनाएं मानते हैं। इसके अंतर्गत रामचरितमानस, पार्वती-मंगल, गीतावली, कृष्ण-गीतावली का समावेश होता है।
अंतिम श्रेणी में उनकी उत्तरकालीन रचनाएं आती हैं। इनमें कवि की प्रौढ़ प्रतिभा ज्यों की त्यों बनी हुई है और कुछ में वह आध्यात्मिक विचारों को प्राधान्य देता हुआ दिखाई पड़ता है। साथ ही वह अपनी अंतिम जरावस्था का संकेत भी करता है तथा अपने पतनोन्मुख युग को चेतावनी भी देता है। विनयपत्रिका, बरवै रामायण, कवितावली, हनुमान बाहुक और दोहावली इसी श्रेणी की कृतियां मानी जा सकती हैं।
उसकी दीनावस्था से द्रवीभूत होकर एक संत-महात्मा ने उसे राम की भक्ति का उपदेश दिया। उस बालक नेबाल्यकाल में ही उस महात्मा की कृपा और गुरु-शिक्षा से विद्या तथा रामभक्ति का अक्षय भंडार प्राप्त कर लिया। इसके पश्चात् साधुओं की मंडली के साथ, उसने देशाटन करके प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया।
गोस्वामी जी की साहित्यिक जीवनी के आधार पर कहा जा सकता है कि वे आजन्म वही रामगुण -गायक बने रहे जो वे बाल्यकाल में थे। इस रामगुण गान का सर्वोत्कृष्ट रुप में अभिव्यक्त करने के लिए उन्हें संस्कृत-साहित्य का अगाध पांडित्य प्राप्त करना पड़ा। रामललानहछू, वैराग्य-संदीपनी और रामाज्ञा-प्रश्न इत्यादि रचनाएं उनकी प्रतिभा के प्रभातकाल की सूचना देती हैं। इसके अनंतर उनकी प्रतिभा रामचरितमानस के रचनाकाल तक पूर्ण उत्कर्ष को प्राप्त कर ज्योतिर्मान हो उठी। उनके जीवन का वह व्यावहारिक ज्ञान, उनका वह कला-प्रदर्शन का पांडित्य जो मानस, गीतावली, कवितावली, दोहावली और विनयपत्रिका आदि में परिलक्षित होता है, वह अविकसित काल की रचनाओं में नहीं है।
उनके चरित्र की सर्वप्रधान विशेषता है उनकी रामोपासना।
धरम के सेतु जग मंगल के हेतु भूमि ।
भार हरिबो को अवतार लियो नर को ।
नीति और प्रतीत-प्रीति-पाल चालि प्रभु मान,
लोक-वेद राखिबे को पन रघुबर को ।।
(कवितावली, उत्तर, छंद० ११२)
काशी-वासियों के तरह-तरह के उत्पीड़न को सहते हुए भी वे अपने लक्ष्य से भ्रष्ट नहीं हुए। उन्होंने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए अपनी निर्भीकता एवं स्पष्टवादिता का संबल लेकर वे कालांतर में एक सिद्ध साधक का स्थान प्राप्त किया।गोस्वामी तुलसीदास प्रकृत्या एक क्रांतदर्शी कवि थे। उन्हें युग-द्रष्टा की उपाधि से भी विभूषित किया जाना चाहिए था। उन्होंने तत्कालीन सांस्कृतिक परिवेश को खुली आंखों देखा था और अपनी रचनाओं में स्थान-स्थान पर उसके संबंध में अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की है। वे सूरदास, नन्ददास आदि कृष्णभक्तों की भांति जन-सामान्य से संबंध-विच्छेद करके एकमात्र आराध्य में ही लौलीन रहने वाले व्यक्ति नहीं कहे जा सकते बल्कि उन्होंने देखा कि तत्कालीन समाज प्राचीन सनातन परंपराओं को भंग करके पतन की ओर बढ़ा जा रहा है। शासकों द्वारा सतत शोषित दुर्भिक्ष की ज्वाला से दग्ध प्रजा की आर्थिक और सामाजिक स्थिति किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पहुंच गई है –
खेती न किसान को,
भिखारी को न भीख, बलि,
वनिक को बनिज न,
चाकर को चाकरी ।
जीविका विहीन लोग
सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों
कहाँ जाई, का करी ।।
समाज के सभी वर्ग अपने परंपरागत व्यवसाय को छोड़कर आजीविका-विहीन हो गए हैं। शासकीय शोषण के अतिरिक्त भीषण महामारी, अकाल, दुर्भिक्ष आदि का प्रकोप भी अत्यंत उपद्रवकारी है। काशीवासियों की तत्कालीन समस्या को लेकर यह लिखा –
संकर-सहर-सर, नारि-नर बारि बर,
विकल सकल महामारी मांजामई है ।
उछरत उतरात हहरात मरि जात,
भभरि भगात, थल-जल मीचुमई है ।।
उन्होंने तत्कालीन राजा को चोर और लुटेरा कहा –
गोड़ गँवार नृपाल महि,
यमन महा महिपाल ।
साम न दाम न भेद कलि,
केवल दंड कराल ।।
साधुओं का उत्पीड़न और खलों का उत्कर्ष बड़ा ही विडंबनामूलक था –
वेद धर्म दूरि गये,
भूमि चोर भूप भये,
साधु सीद्यमान,
जान रीति पाप पीन की।
उस समय की सामाजिक अस्त-व्यस्तता का यदि संक्षिप्ततम चित्र –
प्रजा पतित पाखंड पाप रत,
अपने अपने रंग रई है ।
साहिति सत्य सुरीति गई घटि,
बढ़ी कुरीति कपट कलई है।
सीदति साधु, साधुता सोचति,
खल बिलसत हुलसत खलई है ।।
उन्होंने अपनी कृतियों के माध्यम से लोकाराधन, लोकरंजन और लोकसुधार का प्रयास किया और रामलीला का सूत्रपात करके इस दिशा में अपेक्षाकृत और भी ठोस कदम उठाया। गोस्वामी जी का सम्मान उनके जीवन-काल में इतना व्यापक हुआ कि अब्दुर्रहीम खानखाना एवं टोडरमल जैसे अकबरी दरबार के नवरत्न, मधुसूदन सरस्वती जैसे अग्रगण्य शैव साधक, नाभादास जैसे भक्त कवि आदि अनेक समसामयिक विभूतियों ने उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उनके द्वारा प्रचारित राम और हनुमान की भक्ति भावना का भी व्यापक प्रचार उनके जीवन-काल
में ही हो चुका था।रामचरितमानस ऐसा महाकाव्य है जिसमें प्रबंध-पटुता की सर्वांगीण कला का पूर्ण परिपाक हुआ है में उन्होंने उपासना और साधना-प्रधान एक से एक बढ़कर विनयपत्रिका के पद रचे और लीला-प्रधान गीतावली तथा कृष्ण-गीतावली के पद। उपासना-प्रधान पदों की जैसी व्यापक रचना तुलसी ने की है, वैसी इस पद्धति क कवि सूरदास ने भी नहीं की।
काव्य-गगन के सूर्य तुलसीदास ने अपने अमर आलोक से हिन्दी साहित्य-लोक को सर्वभावेन देदीप्यमान किया। उन्होंने काव्य के विविध स्वरुपों तथा शैलियों को विशेष प्रोत्साहन देकर भाषा को खूब संवारा और शब्द-शक्तियों, ध्वनियों एवं अलंकारों के यथोचित प्रयोगों के द्वारा अर्थ क्षेत्र का अपूर्व विस्तार भी किया। उनकी साहित्यिक देन भव्य कोटि का काव्य होते हुए भी उच्चकोटि का ऐसा शास्र है, जो किसी भी समाज को उन्नयन के लिए आदर्श, मानवता एवं आध्यात्मिकता की त्रिवेणी में अवगाहन करने का सुअवसर देकर उसमें सत्पथ पर चलने की उमंग भरता है।
तुलसीदास की धार्मिक विचारधारा
उनके विचार से वही धर्म सर्वोपरि है जो समग्र विश्व के सारे प्राणियों के लिए शुभंकर और मंगलकारी हो और जो सर्वथा उनका पोषक, संरक्षक और संवर्द्धक हो। उनके नजदीक धर्म का अर्थ पुण्य, यज्ञ, यम, स्वभाव, आवार, व्यवहार, नीति या न्याय, आत्म-संयम, धार्मिक संस्कार तथा आत्म-साक्षात्कार है। उनकी दृष्टि में धर्म विश्व के जीवन का प्राण और तेज है।सत्यतः धर्म उन्नत जीवन की एक महत्त्वपूर्ण और शाश्वत प्रक्रिया और आचरण-संहिता है जो समष्टि-रुप समाज के व्यष्टि-रुप मानव के आचरण तथा कर्मों को सुव्यवस्थित कर रमणीय बनाता है तथा मानव जीवन में उत्तरोत्तर विकास लाता हुआ उसे मानवीय अस्तित्व के चरम लक्ष्य तक पहुंचाने योग्य बनाता है।
विश्व की प्रतिष्ठा धर्म से है तथा वह परम पुरुषार्थ है। इन तीनों धामों में उनका नैक प्राप्त करने के प्रयत्न को सनातन धर्म का त्रिविध भाव कहा गया ह। त्रिमार्गगामी इस रुप में है कि वह ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनो में से किसी एक द्वारा या इनके सामंजस्य द्वारा भगवान की प्राप्ति की कामना करता है उसकी त्रिपथगामिनी गति है।
वह त्रिकर्मरत भी है। मानव-प्रवृत्तियों में सत्य, प्रेम और शक्ति, ये तीन सर्वाधिक ऊर्ध्वगामिनी वृत्तियां हैं। धर्म है आत्मा से आत्मा को देखना, आत्मा से आत्मा को जानना और आत्मा में स्थित होना।
उन्होंने सनातन धर्म की सारी विधाओं को भगवान की अनन्य सेवा की प्राप्ति के साधन के रुप में ही स्वीकार किया है। उनके समस्त साहित्य में विशेषतः भक्त – स्वभाव वर्णन, धर्म-रथ वर्णन, संत-लक्षण वर्णन, ब्राह्मण-गुरु स्वरुप वर्णन तथा सज्जन-धर्म निरुपण, आदि प्रसंगों में ज्ञान, विज्ञान, विराग, भक्ति, धर्म, सदाचार एवं स्वयं भगवान से संबंधित आत्म-बोध तथा आत्मोत्थान के सभी प्रकार के श्रेष्ठ साधनों का सजीव चित्रण किया गया है। उनके काव्य-प्रवाह में उल्लसित धर्म-कुसुम मात्र कथ्य नहीं बल्कि, अलभ्य चारित्र्य हैं जो विभिन्न उदात्त चरित्रों के कोमल वृत्तों से जगतीतल पर आमोद बिखेरते हैं।
महाभारत में यह वर्णन है कि ब्रह्मा ने संपूर्ण जगत की रक्षा के लिए त्रिरुपात्मक धर्म का विधान किया है –
१ वेदोक्त धर्म जो सर्वोत्कृष्ट धर्म है
२ वेदानुकूल स्मृति-शास्रोक्त स्मा धर्म तथा
३ शिष्ट पुरुषों द्वारा आचरित धर्म (शिष्टाचार)
ये तीनों सनातन धर्म के नाम से विख्यात हैं। संपूर्ण कर्मों की सिद्ध क लिए श्रुति-समृतिरुप शास्र तथा श्रेष्ठ पुरुषों का आचार, ये ही दो साधन हैं।
मनुस्मृति के अनुसार धर्म के पांच उपादान माने गए हैं –
१ अखिल वेद
२ वेदज्ञों की स्मृतियां
३ वेदज्ञों के शील
४ साधुओं के आचार तथा
५ मनस्तुष्टि।
याज्ञवल्क्य-स्मृति में भी लगभग इसी प्रकार के पांच उपादान उपलब्ध हैं –
१ श्रुति
२ समृति
३ सदाचार
४ आत्मप्रियता
५ सम्यक् संकल्पज सदिच्छा।
भक्त-दार्शनिको ने पुराणों को भी सनातन धर्म का शाश्वत प्रमाण माना है। धर्म के मूल उपादान केवल तीन ही रह जाते हैं –
१ श्रुति-स्मृति पुराण
२ सदाचार तथा
३ मनस्तुष्टि या आत्मप्रियता।
गोस्वामी जी की दृष्टि में ये ही तीन धर्म हेतु हैं और मानव समाज के धर्माधर्म, कर्त्तव्याकर्त्तव्य और औचित्यानौचित्य के मूल निर्णायक भी हैं।
धर्म के प्रमुख तीन आधार हैं –
१ नैतिक
२ भाविक तथा
३ बौद्धिक।
नीति धर्म की परिधि और परिबंध है। इसके अभाव में कोई भी धर्माचरण संभव नहीं है, क्योंकि इसके बिना समाज-विग्रह का अंतस् और बाह्य दोनों ही सार-हीन हो जाते हैं। यह सत्कर्मों का प्राणस्रोत है। अतः नीति-तत्त्व पर धर्म की सुदृढ़ स्थापना होती है। धर्म का आधार भाविक होता है। यह सच है कि सेवक अपने स्वामी के प्रति निश्छल सेवा अर्पित करे – यही नीति है, किंतु जब वह अनन्य भाव से अपने प्रभु के चरणों पर सर्व न्यौछावर कर उनके श्रप, गुण एवं शील का याचक बन जाता है तब उसके इस त्यागमय कर्त्तव्य या धर्म का आधार भाविक हो जाता है।
धर्म का बौद्धिक धरातल मानव को कार्य-कुशलता तथा सफलता की ओर ले जाता है। वस्तुतः जो धर्म उक्त तीनों मुख्याधारों पर आधारित है वह स्वार्थ, परमार्थ तथा लोकार्थ इन तीनों का समन्वयकारी है। धर्म के ये सर्वमान्य आधार-तत्त्व हैं।
धर्म के मुख्यतः दो स्वरुप हैं –
१ अभ्युदय हेतुक तथा
२ नि:रेयस हेतुक।
जो पावन कृत्य सुख, संपत्ति, कीर्ति और दीर्घायु के लिए अथवा जागृति उन्नयन के लिए किया जाता है वह अभ्युदय हेतुक धर्म की श्रेणी में आता है। और जो कृत्य या अनुष्ठान आत्मकल्याण अथवा मोक्षादि की प्राप्ति के लिए किया जाता है वह नि:श्रेयस हेतुक धर्म की श्रेणी में आता है।
धर्म पुनः दो प्रकार का है
१ प्रवृत्ति-धर्म तथा
२ निवृत्ति-धर्म या मोक्ष धर्म
जिससे लोक-परलोक में सर्वाधिक सुख प्राप्त होता है वह प्रवृत्ति-धर्म है तथा जिससे मोक्ष या परम शांति की प्राप्ति होती है वह निवृत्ति-धर्म है।
कहीं – कहीं धर्म के तीन भेद स्वीकार किए गए हैं –
१ सामान्य धर्म
२ विशेष धर्म तथा
३ आपद्धर्म ।
भविष्यपुराण के अनुसार धर्म के पांच प्रकार हैं –
१ वर्ण – धर्म
२ आश्रम – धर्म
३ वर्णाश्रम – धर्म
४ गुण – धर्म
५ निमित्त – धर्म
अंततोगत्वा, हमारे सामने धर्म की मुख्य दो ही विशाल विधाए या शाखाएं रह जाती हैं –
१ सामान्य या साधारण धर्म तथा
२ वर्णाश्रम – धर्म।
जो सारे धर्म, देश, काल, परिवेश, जाति, अवस्था, वर्ग तथा लिंग, आदि के भेद-भाव के बिना सभी आश्रमों और वणाç के लोगों के लिए समान रुप से स्वीकार्य हैं वे सामान्य या साधारण धर्म कहे जाते हैं। समग्र मानव जाति के लिए कल्याणप्रद एवं अनुकरणीय इस सामान्य धर्म की शतशः चर्चा अनेक धर्म-ग्रंथों में विशेषतया श्रुति-ग्रन्थों में उपलब्ध है।
महाभारत ने अपने अनेक पवाç तथा अध्यायों में जिन साधारण धर्मों का वर्णन किया है, उनके दया, क्षमा, शांति, अहिंसा, सत्य, सारल्य, अद्रोह, अक्रोध, निभिमानता, तितिक्षा, इन्द्रिय-निग्रह, यम,शुद्ध बुद्धि, शील, आदि मुख्य हैं। पद्मपुराण में सत्य, तप, यम, नियम, शौच, अहिंसा, दया, क्षमा, श्रद्धा, सेवा, प्रज्ञा तथा मैत्री आदि धर्मान्तर्गत परिगणित हैं। मार्कण्डेय पुराण ने सत्य, शौच, अहिंसा, अनसूया, क्षमा, अक्रूरता, अकृपणता तथा संतोष इन आठ गुणों को वर्णाश्रम का सामान्य धर्म स्वीकार किया है।
विश्व की प्रतिष्ठा धर्म से है तथा वह परम पुरुषार्थ है। वह त्रिविध, त्रिपथगामी तथा त्रिकमर्रत है। परमात्मा ने अपने को गदात्मा, सूक्ष्म जगत तथा स्थूल जगत के रुप में प्रकट किया है। इन तीनों धामों में उनका नैकट्य प्राप्त करने के प्रयत्न को सनातन धर्म का त्रिविध भाव कहा गया है। वह त्रिमार्गगामी इस रुप में है कि वह ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनों में से किसी एक द्वारा या इनके सामंजस्य द्वारा भगवान की प्राप्ति की कामना करता है। उसकी त्रिपथगामिनी गति है।
सामान्यतः गोस्वामीजी के वर्ण और आश्रम एक-दूसरे के साथ परस्परावलंबित और संघोषित हैं। इसलिए उन्होंने दोनों का युगपत् वर्णन किया है। यह स्पष्ट है कि भारतीय जीवन में वर्ण-व्यवस्था की प्राचीनता, व्यापकता, महत्ता और उपादेयता सर्वमान्य हैं। यह सत्य है कि हमारा विकासोन्मुख जीवन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ वणाç की सीढियों पर चढ़कर शनै:-शनै: दुर्लभ
पुरुषार्थ-फलों का आस्वादन करता हुआ भगवत् तदाकार भाव में निमज्जित हो जाता है, पर आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम निष्ठापूर्वक अपने वर्ण-धर्म पर अपनी दृढ़ आस्था दिखलाई है और उसे सुखी और सुव्यवस्थित समाज – पुरुष का मेरु-दण्ड बतलाया है।
गोस्वामी जी सनातनी हैं और सनातन-धर्म की यह निर्भ्रान्त धारणा है कि चारों वर्ण मनुष्य के उन्नयन के चार सोपान हैं। चेतनोन्मुखी प्राणी प्रथमतः शुद्र योनि में जन्म धारण करता है जिसमें उसके अंतर्गत सेवा-वृत्ति का उद्भव और विकास होता है। यह उसकी शैशवावस्था है। तत्पश्चात् वह वैश्य योनि में जन्म धारण करता है जहां उसे सब प्रकार के भोग, सुख, वैभव और प्रेय की प्राप्ति होती है। यह उसका पूर्व-यौवन काल है।
वर्ण विभाजन का जन्मना आधार न केवल महर्षि वशिष्ठ, मनु आदि ने ही स्वीकार किया है, बल्कि स्वयं गीता में भगवान ने भी श्रीमुख से चारों वणाç की गुणकर्म-विभगशः सृष्टि का विधान किया है। वर्णाश्रम-धर्म की स्थापना जन्म, कर्म, आचरण तथा स्वभाव के अनुकूल हुई है।
जो वीरोचित कर्मों में निरत रहता है और प्रजाओं की रक्षा करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है। शौर्य, वीर्य, धृति, तेज, अजातशत्रुता, दान, दाक्षिण्य तथा परोपकार क्षत्रियों के नैसर्गिक गुण हैं। स्वयं भगवान श्रीराम क्षत्रिय कुल भूषण और उक्त गुणों के संदोह हैं। न्याय-नीति विहीन, डरपोक और युद्ध-विमुख क्षत्रिय धर्मच्युत और पामर है। विश का अर्थ जन या दल है। इसका एक अर्थ देश भी है। अतः वैश्य का संबंध जन-समूह अथवा देश के भरण-पोषण से है।
सत्यतः वैश्य समाज के विष्णु माने जाते हैं। अतिथि-सेवा तथा विप्र-पूजा उनका धर्म है। जो वैश्य कृपण और अतिथि-सेवा से विमुख हैं वे हेय और शोचनीय हैं। कुल, शील, विद्या और ज्ञान से हीन वर्ण को शूद्र की संज्ञा मिली है। शूद्र असत्य और यज्ञहीन माने जाते थे। शनै:-शनै: वे द्विजातियों के कृपा-पात्र और समाज के अभिन्न और सबल अंग बन गए। उच्च वणाç के सम्मुख विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना, स्वामी की निष्कपट सेवा करना, पवित्रता रखना, गौ तथा विप्र की रक्षा करना आदि शूद्रों के विशेषण हैं।
गोस्वामी जी का यह विश्वास रहा है कि वर्णानुकूल धर्माचरण से स्वर्गापवर्ग की प्राप्ति होती है। और उसके उल्लंघन करने और परधर्म-प्रिय होने से घोर यातना ओर नरक की प्राप्ति होती है। दूसरे प्राणी के श्रेष्ठ धर्म की अपेक्षा अपना सामान्य धर्म ही पूज्य और उपादेय है। दूसरे के धर्म में दीक्षित होने की अपेक्षा अपने धर्म की वेदी पर प्राणापंण कर देना श्रेयस्कर है।
यही कारण् है कि उन्होंने राम-राज्य की सारी प्रजाओं को स्व-धर्म-व्रतानुरागी और दिव्य चारित्र्य-संपन्न दिखलाया है।
गोस्वामी जी के इष्टदेव श्रीराम स्वयं उक्त राज-धर्म के आश्रय और आदर्श रामराज्य के जनक हैं। यद्यपि वे साम्राज्य-संस्थापक हैं तथापि उनके साम्राज्य की शाश्वत आधारशिला सनेह, सत्य, अहिंसा, दान, त्याग, शान्ति, सुमति, विवेक, वैराग्य, क्षमा, न्याय, औचित्य तथा विज्ञान हैं जिनकी प्रेरणा से राजा साम्राज्य के सारे विभागों का परिपालन उसी धर्म बुद्धि से करते हैं जिससे मुख शरीर के सारे अंगो का यथाचित परिपालन करता है। श्रीराम की एकतंत्रात्मक राज-व्यवस्था में राज-कार्य के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण अवसरों पर राजा, मनीषियों, मंत्रियों तथा सभ्यों से समुचित सम्मति प्राप्त करने की विनीत चेष्टा करते हैं ओर उपलब्ध सम्मति को सहर्ष कार्यान्वित करते हैं।
राजा श्रीराम में उक्त सारे लक्षण विलक्षण रुप में वर्तमान हैं, वे भूप-गुणागार हैं। उनमें सत्य-प्रियता, साहसात्साह, गंभीरता तथा प्रजा-वत्सलता, आदि मानव-दुर्लभ गुण सहज ही सुलभ हैं। एक स्थल पर श्रीराम ने राज-धर्म के मूल स्वरुप का परिचय कराते हुए भाई भरत को यह उपदेश दिया है कि पूज्य पुरुषों, माताओं और गुरुजनों के आज्ञानुसार राज्य, प्रजा और राजधानी का न्याय और नीतिपूर्वक सम्यक् परिपालन करना ही राज-धर्म का मूलमंत्र है।
मानव-जीवन पर काल, स्वभाव और परिवेश का गहरा प्रभाव पड़ता है। यह स्पष्ट है कि काल-प्रवाह के कारण समाज के आचारों, विचारों तथा मनोभावों में ह्रास-विकास होते रहते हैं। यही कारण है कि जब सत्य की प्रधानता रहती है तब सत्य-युग, जब रजोगुण का समावेश होता है तब त्रेता, जब रजोगुण का विस्तार होता है तब द्वापर तथा जब पाप का प्राधान्य होता है तब कलियुग का आगमन होता है।
गोस्वामी जी ने नारी-धर्म की भी सफल स्थापना की है और समाज के लिए उसे अतिशय उपादेय माना है। गृहस्थ-जीवन रथ के दो चक्रों में एक चक्र स्वयं नारी है। यह जीवन-प्रगति-विधायिका है। इसी कारण हमारी संस्कृति में नारी को अद्धार्ंगिनी, धर्म-पत्नी, जीवन-संगिनी, देवी, गृह-लक्ष्मी तथा संजीवनी-शक्ति के रुप में देखा है।
जिस प्रकार सृष्टि-लीला-विलास में पुरुष प्रकृति परस्पर संयुक्त होकर विकास-रचना करते हैं, उसी प्रकार गृह या समाज में नारी-पुरुष के प्रीतिपूर्वक सुखमय संयोग से धर्म-कर्म का पुण्यमय प्रसार होता है। सत्यतः रति, प्रीति और धर्म की पालिका स्री या पत्नी ही है। वह धन, प्रजा, काया, लोक-यात्रा, धर्म, देव और पितर आदि, इन सबकी रक्षा करती है। स्री या नारी ही पुरुष की श्रेष्ठ गति है – “दारा:परागति:’। स्री ही प्रियवादिनी, कांता, सुखद मंत्रणा देनेवाली, संगिनी, हितैषिणी और दु:ख में हाथ बंटाने वाली देवी है। अतः जीवन और समाज की सुखद प्रगति और मधुर संतुलन के लिए तथा स्वयं नारी की मुक्ति-मुक्ति के लिए नारी-धर्म के सम्यक् विधान की अपेक्षा है।
रामचरितमानस की मनोवैज्ञानिकता
हिन्दी साहित्य का सर्वमान्य एवं सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य “रामचरितमानस” मानव संसार के साहित्य के सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों एवं महाकाव्यों में से एक है। विश्व के सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य ग्रंथ के  साथ रामचरित मानस को ही प्रतिष्ठित करना समीचीन है | वह वेद, उपनिषद, पुराण, बाईबल, इत्यादि के मध्य भी पूरे गौरव के साथ खड़ा किया जा सकता है। इसीलिए यहां पर तुलसीदास रचित महाकाव्य रामचरित मानस प्रशंसा में प्रसादजी के शब्दों में इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि –
राम छोड़कर और की जिसने कभी न आस की,
रामचरितमानस-कमल जय हो तुलसीदास की।
अर्थात यह एक विराट मानवतावादी महाकाव्य है, जिसका अध्ययन अब हम एक मनोवैज्ञानिक ढ़ंग से करना चाहेंगे, जो इस प्रकार है – जिसके अन्तर्गत श्री महाकवि तुलसीदासजी ने श्रीराम के व्यक्तित्व को इतना लोकव्यापी और मंगलमय रूप दिया है कि उसके स्मरण से हृदय में पवित्र और उदात्त भावनाएं जाग उठती हैं। परिवार और समाज की मर्यादा स्थिर रखते हुए उनका चरित्र महान है कि उन्हें मर्यादा पुरूषोतम के रूप में स्मरण किया जाता ह। वह पुरूषोत्तम होने के साथ-साथ दिव्य गुणों से विभूषित भी हैं। वह ब्रह्म रूप ही है, वह साधुओं के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए ही पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यदि कहना चाहे तो भी राम के चरित्र में इतने अधिक गुणों का एक साथ समावेश होने के कारण जनता उन्हें अपना आराध्य मानती है, इसीलिए महाकवि तुलसीदासजी ने अपने ग्रंथ रामचरितमानस में राम का पावन चरित्र अपनी कुशल लेखनी से लिखकर देश के धर्म, दर्शन और समाज को इतनी अधिक प्रेरणा दी है कि शताब्दियों के बीत जाने पर भी मानस मानव मूल्यों की अक्षुण्ण निधि के रूप में मान्य है। अत: जीवन की समस्यामूलक वृत्तियों के समाधान और उसके व्यावहारिक प्रयोगों की स्वभाविकता के कारण तो आज यह विश्व साहित्य का महान ग्रंथ घोषित हुआ है, और इस का अनुवाद भी आज संसार की प्राय: समस्त प्रमुख भाषाओं में होकर घर-घर में बस गया है।
एक जगह डॉ. रामकुमार वर्मा – संत तुलसीदास ग्रंथ में कहते हैं कि ‘रूस में मैंने प्रसिध्द समीक्षक तिखानोव से प्रश्न किया था कि ”सियाराम मय सब जग जानी” के आस्तिक कवि तुलसीदास का रामचरितमानस ग्रंथ आपके देश में इतना लोकप्रिय क्यों है? तब उन्होंने उत्तर दिया था कि आप भले ही राम को अपना ईश्वर माने, लेकिन हमारे समक्ष तो राम के चरित्र की यह विशेषता है कि उससे हमारे वस्तुवादी जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान मिल जाता है। इतना बड़ा चरित्र समस्त विश्व में मिलना असंभव है। ‘ ऐसा संत तुलसीदासजी का रामचरित मानस है।”
मनोवैज्ञानिक ढ़ंग से अध्ययन किया जाये तो रामचरित मानस बड़े भाग मानुस तन पावा के आधार पर अधिष्ठित है, मानव के रूप में ईश्वर का अवतार प्रस्तुत करने के कारण मानवता की सर्वोच्चता का एक उदगार है। वह कहीं भी संकीर्णतावादी स्थापनाओं से बध्द नहीं है। वह व्यक्ति से समाज तक प्रसरित समग्र जीवन में उदात्त आदर्शों की प्रतिष्ठा भी करता है। अत: तुलसीदास रचित रामचरित मानस को मनोबैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये तो कुछ विशेष उल्लेखनीय बातें हमें निम्मलिखित रूप में देखने को मिलती हैं –
तुलसीदास एवं समय संवेदन में मनोवैज्ञानिकता :
तुलसीदासजी ने अपने समय की धार्मिक स्थिति की जो आलोचना की है उसमें एक तो वे सामाजिक अनुशासन को लेकर चिंतित दिखलाई देते हैं, दूसरे उस समय प्रचलित विभत्स साधनाओं से वे खिन्न रहे हैं। वैसे धर्म की अनेक भूमिकाएं होतीं हैं, जिनमें से एक सामाजिक अनुशासन की स्थापना है।
रामचरितमानस में उन्होंने इस प्रकार की धर्म साधनाओं का उल्लेख ‘तामस धर्म’ के रूप में करते हुए उन्हें जन-जीवन के लिए अमंगलकारी बताया है।
तामस धर्म करहिं नर जप तप व्रत मख दान,
देव न बरषहिं धरती बए न जामहि धान॥”3
इस प्रकार के तामस धर्म को अस्वीकार करते हुए वहां भी उन्होंने भक्ति का विकल्प प्रस्तुत किया हैं।
अपने समय में तुलसीदासजी ने मर्यादाहीनता देखी। उसमें धार्मिक स्खलन के साथ ही राजनीतिक अव्यवस्था की चेतना भी सम्मिलित थी। रामचरितमानस के कलियुग वर्णन में धार्मिक मर्यादाएं टूट जाने का वर्णन ही मुख्य रूप से हुआ है, मानस के कलियुग वर्णन में द्विजों की आलोचना के साथ शासकों पर किया किया गया प्रहार निश्चय ही अपने समय के नरेशों के प्रति उनके मनोभावों का द्योतक है। इसलिए उन्होंने लिखा है –
द्विजा भूति बेचक भूप प्रजासन।4
अन्त: साक्ष्य के प्रकाश में इतना कहा जा सकता है कि इस असंतोष का कारण शासन द्वारा जनता की उपेक्षा रहा है। रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने बार-बार अकाल पड़ने का उल्लेख भी किया है जिसके कारण लोग भूखों मर रहे थे –
कलि बारहिं बार अकाल परै,
बिनु अन्न दु:खी सब लोग मरै।5
इस प्रकार रामचरितमानस में लोगों की दु:खद स्थिति का वर्णन भी तुलसीदासजी का एक मनोवैज्ञानिक समय संवेदन पक्ष रहा है।
तुलसीदास एवं मानव अस्तित्व की यातना :
यहां पर तुलसीदासजी ने अस्तित्व की व्यर्थतता का अनुभव भक्ति रहित आचरण में ही नहीं, उस भाग दौड़ में भी किया है, जो सांसारिक लाभ लोभ के वशीभूत लोग करते हैं। वस्तुत:, ईश्वर विमुखता और लाभ लोभ के फेर में की जानेवाली दौड़ धूप तूलसीदास की दृष्टि में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ध्यान देने की बात तो यह है कि तुलसीदासजी ने जहां भक्ति रहित जीवन में अस्तित्व की व्यर्थता देखी है, वही भाग दौड़ भरे जीवन की उपलध्धि भी अनर्थकारी मानी हैं। यथा –
जानत अर्थ अनर्थ रूप-भव-कूप परत एहि लागै।6
इस प्रकार इन्होंने इसके साथ सांसारिक सुखों की खोज में निरर्थक हो जाने वाले आयुष्य क्रम के प्रति भी ग्लानि व्यक्त की है।
तुलसीदास की आत्मदीप्ति :
तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में स्पष्ट शब्दों में दास्य भाव की भक्ति प्रतिपादित की है –
सेवक सेव्य भाव, बिनु भव न तरिय उरगारि।7
साथ-साथ रामचरित मानस में प्राकृतजन के गुणगान की भर्त्सना अन्य के बड़प्पन की अस्वीकृति ही हैं। यहीं यह कहना कि उन्होंने रामचरितमानस’ की रचना ‘स्वान्त: सुखाय’ की हैं, अर्थात तुलसीदासजी के व्यक्तित्व की यह दीप्ति आज भी हमें विस्मित करती हैं।
मानस के जीवन मूल्यों का मनोवैज्ञानिक पक्ष :
इसके अन्तर्गत मनोवैज्ञानिकता के संदर्भ में रामराज्य को बताने का प्रयत्न किया गया है।
मनोवैज्ञानिक अध्ययन से ‘रामराज्य’ में स्पष्टत: तीन प्रकार हमें मिलते हैं (1) मन: प्रसाद (2) भौतिक समृध्दि और (3) वर्णाश्रम व्यवस्था।
तुलसीदासजी की दृष्टि में शासन का आदर्श भौतिक समृध्दि नहीं है।मन: प्रसाद उसका महत्वपूर्ण अंग है। अत: रामराज्य में मनुष्य ही नहीं, पशु भी बैर भाव से मुक्त हैं। सहज शत्रु, हाथी और सिंह वहां एक साथ रहते हैं –
रहहिं एक संग गज पंचानन
भौतिक समृध्दि :
वस्तुत: मन संबंधी मूल्य बहुत कुछ भौतिक परिस्थितियाें पर निर्भर रहते हैं। भौतिक परिस्थितियों से निरपेक्ष सुखी जन मन की कल्पना नहीं की जा सकती। दरिद्रता और अज्ञान की स्थिति में मन संयमन की बात सोचना भी निरर्थक हैं।
वर्णाश्रम व्यवस्था :
तुलसीदासजी ने समाज व्यवस्था-वर्णाश्रम के प्रश् के सदैव मनोवैज्ञानिक परिणामों के परिपार्श्व में उठाया हैं जिस कारण से कलियुग संतप्त हैं, और रामराज्य तापमुक्त है – वह है कलियुग में वर्णाश्रम की अवमानना और रामराज्य में उसका परिपालन।
साथ-साथ तुलसीदासजी ने भक्ति और कर्म की बात को भी निर्देशित किया है।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने भक्ति की महिमा का उद्धोष करने के साथ ही साथ शुभ कर्मो पर भी बल दिया है। उनकी मान्यता है कि संसार कर्म प्रधान है। यहां जो कर्म करता है, वैसा फल पाता है –
करम प्रधान बिरख करि रख्खा,
जो जस करिए सो-तस फल चाखा।8
आधुनिकता के संदर्भ में रामराज्य :
रामचरितमानस में उन्होंने अपने समय में शासक या शासन पर सीधे कोई प्रहार नहीं किया। लेकिन सामान्य रूप से उन्होंने शासकों को कोसा है, जिनके राज्य में प्रजा दु:खी रहती है –
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी,
सो नृप अवसि नरक अधिकारी।9
अर्थात यहां पर विशेष रूप से प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता सम्पन्न शासन की प्रशंसा की है। अत: राम ऐसे ही समर्थ और स्वच्छ शासक है और ऐसा राज्य ‘सुराज’ का प्रतीक है।
रामचरितमानस में वर्णित रामराज्य के विभिन्न अंग समग्रत: मानवीय सुख की कल्पना के आयोजन में विनियुक्त हैं। रामराज्य का अर्थ उनमें से किसी एक अंग से व्यक्त नहीं हो सकता। किसी एक को रामराज्य के केन्द्र में मानकर शेष को परिधि का स्थान देना भी अनुचित होगा, क्योंकि ऐसा करने से उनकी पारस्परिकता को सही सही नहीं समझा जा सकता। इस प्रकार रामराज्य में जिस स्थिति का चित्र अंकित हुआ है वह कुल मिलाकर एक सुखी और सम्पन्न समाज की स्थिति है। लेकिन सुख सम्पन्नता का अहसास तब तक निरर्थक है, जब तक वह समष्टि के स्तर से आगे आकर व्यक्तिश: प्रसन्नता की प्रेरक नहीं बन जाती। इस प्रकार रामराज्य में लोक मंगल की स्थिति के बीच व्यक्ति के केवल कल्याण का विधान नहीं किया गया है। इतना ही नहीं, तुलसीदासजी ने रामराज्य में अल्पवय में मृत्यु के अभाव और शरीर के नीरोग रहने के साथ ही पशु पक्षियों के उन्मुक्त विचरण और निर्भीक भाव से चहकने में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उत्साहपूर्ण और उमंगभरी अभिव्यक्त को भी एक वाणी दी गई है –
अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।
सीतल सुरभि, पवन वट मंदा।
गुंजत अलि लै चलि-मकरंदा॥”
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि रामराज्य एक ऐसी मानवीय स्थिति का द्योतक है जिसमें समष्टि और व्यष्टि दोनों सुखी है।
सादृश्य विधान एवं मनोवैज्ञानिकता :
तुलसीदास के सादृश्य विधान की विशेषता यह नहीं है कि वह घिसा-पिटा है, बल्कि यह है कि वह सहज है। वस्तुत: रामचरितमानस के अंत के निकट रामभक्ति के लिए उनकी याचना में प्रस्तुत किये गये सादृश्य में उनका लोकानुभव झलक रहा है –
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम,
तिमि रघुनाथ-निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।
इस प्रकार प्रकृति वर्णन में भी वर्षा का वर्णन करते समय जब वे पहाड़ों पर बूंदे गिरने के दृश्य संतों द्वारा खल-वचनों को सेटे जाने की चर्चा सादृश्य के ही सहारे हमें मिलते हैं।
अत: तुलसीदासजी ने अपने काव्य की रचना केवल विदग्धजन के लिए नहीं की है। बिना पढ़े लिखे लोगों की अप्रशिक्षित काव्य रसिकता की तृप्ति की चिंता भी उन्हें ही थी जितनी विज्ञजन की।
इस प्रकार रामचरितमानस का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने से यह हमें ज्ञात होता है कि रामचरित मानस केवल रामकाव्य नहीं है, वह एक शिव काव्य भी है, हनुमान काव्य भी है, व्यापक संस्कृति काव्य भी है। शिव विराट भारत की एकता का प्रतीक भी है। तुलसीदास के काव्य की समय सिध्द लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि उसी काव्य रचना बहुत बार आयासित होने पर भी अन्त: स्फूर्ति की विरोधी नहीं, उसकी एक पूरक रही है। निस्संदेह तुलसीदास के काव्य के लोकप्रियता का श्रेय बहुत अंशों में उसकी अन्तर्वस्तु को है। अत: समग्रतया, तुलसीदास रचित रामचरित मानस एक सफल विश्वव्यापी महाकाव्य रहा है।

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