Veergatha Kaal वीरगाथाकाल की प्रमुख विशेषताए

By | July 14, 2016

वीरगाथा काल की प्रमुख विशेषतायें
1:-आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा
2:-वीर तथा श्रृंगार रस की प्रधानता
3:-युद्धों का सजीव चित्रण
4:-नारी सौन्दर्य वर्णन
5:-इतिहास में कल्पना का सामंजस्य
6:-रोसो काव्यों की रचना
7:-संदिग्ध प्रामाणिकता
8:-वीरों की वीरता  का चित्रण
9:-संकुचित राष्ट्रीयता
10:-मुक्तक एवं प्रबंध काव्यों की रचना
11:-छंदों की विविधता
12:-डिंगल-पिंगल भाषा का प्रयोग
(अ):-डिंगल भाषा=अपभ्रंश+राजस्थानी  का योग
(ब):- पिंगल भाषा=अपभ्रंश + ब्रजभाषा का योग
स्मरणीय बिन्दु
आदिकाल में रासो साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है।
सर्वप्रथम फ्रांसीसी विद्वान गार्सा-द-तासी ने ‘रासो ‘शब्द की व्युत्पति पर विचार किया था।
अधिकतर रासो काव्य अप्रामाणिक हैं।
रामकुमार वर्मा जी ने आदिकाल को चारणकाल की संज्ञा दी है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने कालों का नामकरण प्रवृति की प्रधानता के आधार पर किया है।
हिंदी का प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो को माना जाता है।
अमीर खुसरो की पहेलियाँ खड़ी बोली हिंदी में लिखी गई है।
विद्यापति की पदावली मैथिली भाषा में लिखी गई है।
अपभ्रंश का वाल्मीकि कवि स्वयंभू को कहा जाता है।
कवि विद्यापति को ‘अभिनव जयदेव’ की उपाधि मिली  थी।
ग्यारहवीं सदी के लगभग देशभाषा हिन्दी का रूप अधिक स्फुट होने लगा। उस समय पश्चिमी हिन्दी प्रदेश में अनेक छोटे छोटे राजपूत राज्य स्थापित हो गए थे। ये परस्पर अथवा विदेशी आक्रमणकारियों से प्राय: युद्धरत रहा करते थे। इन्हीं राजाओं के संरक्षण में रहनेवाले चारणों और भाटों का राजप्रशस्तिमूलक काव्य वीरगाथा के नाम से अभिहित किया गया। इन वीरगाथाओं को रासो कहा जाता है। इनमें आश्रयदाता राजाओं के शौर्य और पराक्रम का ओजस्वी वर्णन करने के साथ ही उनके प्रेमप्रसंगों का भी उल्लेख है। रासो ग्रन्थों में संघर्ष का कारण प्राय: प्रेम दिखाया गया है। इन रचनाओं में इतिहास और कल्पना का मिश्रण है। रासो वीरगीत (बीसलदेवरासो और आल्हा आदि) और प्रबंधकाव्य (पृथ्वीराजरासो, खमनरासो आदि) – इन दो रूपों में लिखे गए। इन रासो ग्रन्थों में से अनेक की उपलब्ध प्रतियाँ चाहे ऐतिहासिक दृष्टि से संदिग्ध हों पर इन वीरगाथाओं की मौखिक परंपरा अंसदिग्ध है। इनमें शौर्य और प्रेम की ओजस्वी और सरस अभिव्यक्ति हुई है।

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इसी कालावधि में मैथिल कोकिल विद्यापति हुए जिनकी पदावली में मानवीय सौंदर्य ओर प्रेम की अनुपम व्यंजना मिलती है। कीर्तिलता और कीर्तिपताका इनके दो अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। अमीर खुसरो का भी यही समय है। इन्होंने ठेठ खड़ी बोली में अनेक पहेलियाँ, मुकरियाँ और दो सखुन रचे हैं। इनके गीतों, दोहों की भाषा ब्रजभाषा है।

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