गैस Gas- रसायन विज्ञान

गैस (Gas) पदार्थ की तीन अवस्थाओं में से एक अवस्थाका नाम है (अन्य दो अवस्थाएँ हैं – ठोस तथा द्रव)। गैस अवस्था में पदार्थ का न तो निश्चित आकार होता है न नियत आयतन। ये जिस बर्तन में रखे जाते हैं उसी का आकार और पूरा आयतन ग्रहण कर लेते हैं।

जीवधारियों के लिये दो गैसे मुख्य हैं, आक्सीजन गैस जिसके द्वारा जीवधारी जीवित रहता है , दूसरी जिसे जीवधारी अपने शरीर से छोड़ते हैं, उसका नाम कार्बन डाई आक्साइड है। इनके अलावा अन्य गैसों का भी बहु-प्रयोग होता है, जैसे खाना पकाने वाली रसोई गैस। पानी दो गैसों से मिलकर बनता है, आक्सीजन और हाइड्रोजन।

रसायन विज्ञान में पदार्थ की वह भौतिक अवस्था जिसका आकार एवं आयतन दोनों अनिश्चित हो ‘गैस’ कहलाता है।

जैसे- हवा, ऑक्सीजन आदि।

गैसों का कोई पृष्ठ नहीं होता है, गैसों का विसरण बहुत अधिक होता है तथा गैसों को आसानी से संपीड़ित किया जा सकता है।

अंतरतारकीय गैस
अंतरतारकीय गैस तारों के बीच रिक्त स्थानों में उपस्थित रहती है।

यह गैस धूलकणों के साथ पाई जाती है।

गैस के अणु तारों के प्रकाश से विशेष रंगों को सोख लेते हैं और इस प्रकार उनके कारण तारों के वर्णपटों में काली धारियाँ बन जाती हैं। ऐसी काली धारियाँ सामान्यत: तारे के निजी प्रकाश से भी बन सकती हैं।

काली रेखाएँ अंतरतारकीय धूलि से ही बनी होती हैं।

इसका प्रमाण उन युग्मतारों से मिलता है, जो एक-दूसरे के चारों ओर नाचते रहते हैं।

इन तारों में से जब एक हमारी ओर आता रहता है, तब दूसरा हमसे दूर जाता रहता है। परिणाम यह होता है कि ‘डॉपलर नियम’ के अनुसार वर्णपट में एक तारे से आई प्रकाश की काली रेखाएँ कुछ दाहिने हट जाती हैं। इस प्रकार दूसरे तारे के प्रकाश से बनी रेखाएँ दोहरी हो जाती हैं, परंतु अंतरतारकीय गैसों से उत्पन्न काली रेखाएँ इकहरी होती हैं; इसलिए वे तीक्ष्ण रह जाती हैं।

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अंतरतारकीय गैस में कैल्शियम, पोटैशियम, सोडियम, टाइटेनियम और लोहे के अस्तित्व का पता इन्हीं तीक्ष्ण-रेखाओं के आधार पर चला है।

अंतरतारकीय गैस- यह गैस तारों के बीच रिक्त स्थानों में उपस्थित रहती है।

यह गैस धूलकणों के साथ पाई जाती है।

गैस के अणु तारों के प्रकाश से विशेष रंगों को सोख लेते हैं और इस प्रकार उनके कारण तारों के वर्णपटों में काली धारियाँ बन जाती हैं। ऐसी काली धारियाँ सामान्यत: तारे के निजी प्रकाश से भी बन सकती हैं।

काली रेखाएँ अंतरतारकीय धूलि से ही बनी होती हैं।

इसका प्रमाण उन युग्मतारों से मिलता है, जो एक-दूसरे के चारों ओर नाचते रहते हैं।

इन तारों में से जब एक हमारी ओर आता रहता है, तब दूसरा हमसे दूर जाता रहता है। परिणाम यह होता है कि ‘डॉपलर नियम’ के अनुसार वर्णपट में एक तारे से आई प्रकाश की काली रेखाएँ कुछ दाहिने हट जाती हैं। इस प्रकार दूसरे तारे के प्रकाश से बनी रेखाएँ दोहरी हो जाती हैं, परंतु अंतरतारकीय गैसों से उत्पन्न काली रेखाएँ इकहरी होती हैं; इसलिए वे तीक्ष्ण रह जाती हैं। इन अंतरतारकीय गैस में कैल्शियम, पोटैशियम, सोडियम, टाइटेनियम और लोहे के अस्तित्व का पता इन्हीं तीक्ष्ण-रेखाओं के आधार पर चला है।

अश्रु गैस:

‘क्लोरोपिक्रिन’ एक जहरीला रसायन है, जिसका रासायनिक सूत्र CCl3NO2 है। यह अश्रु स्रावक है और त्वचा तथा श्वसन तंत्र के लिए भी हानिकारक है। 3 से 30 सेकण्ड तक 0.3 से 0.37 पीपीएम क्लोरोपिक्रिन के सम्पर्क में आने से अश्रु-स्राव तथा आँखों में दर्द होने लगता है। प्रबल अश्रु स्रावक होने के कारण क्लोरोपिक्रिन का प्रयोग अश्रु गैस के रूप में होता है।

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एक हथियार के रूप में प्रयोग की जाने वाली गैस है।

अनियंत्रित तथा उपद्रव कर रही भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अश्रु गैस का उपयोग किया जाता है।

हालांकि अश्रु गैस छोड़ने के बाद आँख में थोड़ी जलन होती है, लेकिन पानी से धोने के बाद यह जलन तुरंत समाप्त हो जाती है।

जब अश्रु गैस आँखों के सम्पर्क में आती है तो कॉर्निया के स्नायु उत्तेजित हो जाते हैं, जिससे आँख से आंसू निकलने लगता है, दर्द होता है और अंधापन भी हो सकता है।

प्रमुख अश्रुकर गैसें हैं- OC, CS, CR, CN (फेन्यासील क्लोराइड), ब्रोमोएसीटोन, जाइलिल ब्रोमाइड तथा
सिन्-प्रोपेनेथिअल-एस-आक्साइड

अक्रिय गैस (Inert gas) उन गैसों को कहते हैं जो साधारणतः रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग नहीं लेतीं और सदा मुक्त अवस्था में प्राप्य हैं। इनमें हीलियम, निऑन, आर्गान, क्रिप्टॉन,जीनॉन और रेडॉन सम्मिलित हैं।

इनमें से रेडॉन रेडियो-सक्रिय है। ये उत्कृष्ट गैसों (Noble gases) के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। समस्त अक्रिय गैसें रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन होती हैं। स्थिर दाब और स्थिर आयतन पर इन गैसों की विशिष्ट उष्माओं का अनुपात 1.67 के बराबर होता है जिससे पता चलता है कि ये सब एक-परमाणुक गैसें हैं।अक्रिय गैस Xe फ्लूराइड बनाता है।

अक्रिय गैस अक्रिय गैस हीलियम (He), निऑन (Ne), आर्गन (Ar), क्रिप्टन (Kr), जेनान (Xe) तथा रेडॉन (Rn) आवर्त सारणी के शून्य वर्ग के तत्व हैं।

शून्य वर्ग के तत्त्व रासायनिक दृष्टि से निष्किय होते हैं। इस कारण इन तत्वों को अक्रिय गैस या ‘उत्कृष्ट गैस’ कहा जाता हैं।

रेडॉन को छोड़कर अन्य सभी गैसें वायुमंडल में पायी जाती हैं। अक्रिय गैस की खोज का श्रेय ‘लोकेयर’, ‘रैमजे’, ‘रैले’ आदि को जाता है। इन अक्रिय गैसों की प्राप्ति दुर्लभ होने के कारण उन्हें ‘दुर्लभ गैस’ भी कहा जाता है।

अक्रिय गैस उन गैसों को कहते हैं, जो साधारणत: रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग नहीं लेतीं और सदा मुक्त अवस्था में प्राप्य हैं।

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इन गैसों में हीलियम, निऑन, आर्गान, जीनॉन और रडॉन सम्मिलित हैं। ये उत्कृष्ट गैसों के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। समस्त अक्रिय गैसें रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन होती हैं। स्थिर दाब और स्थिर आयतन पर प्रत्येक गैस की विशिष्ट उष्माओं का अनुपात 1.67 के बराबर होता है, जिससे पता चलता है कि ये सब एक परमाणुक गैसें हैं।

हीलियम :-

यह गुब्बारों और वायुपोतों में भरने के काम में आती है। गहरे समुद्र में गोता लगाने वाले साँस लेने के लिए वायु के स्थान पर हीलियम और ऑक्सीजन का मिश्रण काम में लाते हैं। धातु कर्म में जहाँ अक्रिय वायुमंडल की आवश्यकता होती है, हीलियम का प्रयोग किया जाता है।

वायु से यह बहुत हल्की होती है, अत: बड़े- बड़े हवाई जहाजों के टायरों में इसी गैस को भरा जाता है।

नीऑन – बहुत कम दाब पर नीऑन से भरी ट्यूबों में से विद्युत गुजारने पर नारंगी रंग की चमक पैदा होती है, जिसका विद्युत संकेतों में उपयोग किया जाता है।

आर्गन- 26 प्रतिशत नाइट्रोजन के साथ मिलाकर आर्गन विद्युत के बल्बों में तथा रेडियो वाल्बों और ट्यूबों में प्रयुक्त होती है। क्रिप्टान और जीनॉन इनका प्रयोग किसी काम में नहीं होता।

रेडान- यह घातक फोड़ों और ठीक न होने वाले घावों के इलाज में काम आती है।

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