Jayshankar Prasad ka jivan prichay जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

Jayshankar Prasad ka jivan prichay जीवन परिचय- छायावाद के उन्नायक जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 में काशी के सराय गोवर्धन मोहल्ले में सुँघनी साहू नाम के विख्यात वैश्य परिवार में हुआ था। 15 वर्ष की आयु में ही प्रसाद जी के माता-पिता और इनके अग्रज शम्भू रत्न जी का देहांत हो गया। इस प्रकार गृहस्थी का सम्पूर्ण दायित्व इनके कन्धों पर एक साथ आ गया। बीस वर्ष की आयु में इन्होंने अपना विवाह किया। पारिवारिक उलझनों के कारण इनकी शिक्षा व्यवस्थित न रह सकी। घर पर ही अपने गुरु रसमय सिद्ध से इन्होंने उपनिषद, पुराण, वेद और भारतीय दर्शन के अध्ययन के साथ-साथ  ही दुकान का कार्य भी संभाला।
प्रसाद जी नित्य साहित्य सृजन किया करते थे। इस प्रकार अपने संयत एवं नियमित जीवन में आशा-निराशा, सुख-दुःख के कठोरतम क्षणों को धैर्य और कर्मठता के साथ सहन करते हुए 48 वर्ष की आयु में सन् 1937 में इनका देहावसान हो गया।

साहित्यिक योगदान- प्रसाद जी ने गद्य और पद्य दोनों क्षेत्रों में हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। कामायनी( महाकाव्य) आधुनिक युग की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक है।
कृतियाँ-
1. काव्य- कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, चित्राधार, झरना, आंसू, लहर, करुणालय, महाराणा का महत्त्व, कामायनी।
2. उपन्यास- कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण) ।
3. कहानी संग्रह- छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आंधी, इंद्रजाल।
4. नाटक- सज्जन, कल्याणी परिणय, प्रायश्चित, राजश्री, विशाखा, अजातशत्रु, कामना, जनमेजय का नागयज्ञ, स्कन्दगुप्त, एक घूँट, ध्रुवस्वामिनी।
5. निबंध संग्रह- काव्य कला तथा अन्य निबंध।
भाषा- छायावाद के प्रमुख कवि प्रसाद जी की भाषा खड़ी-बोली की सर्वोत्कृष्ट रूप दिखाई पड़ता है। तत्सम शब्दावली के प्रयोग के कारण कहीं-कहीं इनकी भाषा में क्लिष्टता आ गयी है लेकिन अर्थ गंभीर अपने स्वाभाविक रूप में भाषा भावों को व्यक्त करने में सफल हो सका है। खड़ी-बोली में लालित्य और मधुरता लाने का श्रेय प्रसाद जी को है। विचारों की प्रौढ़ता, भाषा का प्रवाह, सुंदर शब्द चयन , लालित्य, अर्थ गाम्भीर्य उनकी भाषा की विशेषतायें हैं।
शैली- प्रसाद ने निबंध लेखन में निम्नलिखित शैलियों का प्रयोग किया है ।
1. भावात्मक शैली – प्रसाद जी की रचना प्रक्रिया नाटक से काव्य लेखन की ओर उन्मुख हुई है। इसलिए नाटक संयोजन पात्र योजना, भावात्मक, मनोभावों की अभिव्यक्ति भावात्मक शैली में हुई है।
2. चित्रात्मक शैली – प्रसाद जी ने जहां वस्तुओं, स्थानों और व्यक्तियों के शब्द चित्र में उपस्थित किए हैं वहां उनकी शैली चित्रात्मक हो गई है ।
3. अलंकारिक शैली- हृदय की प्रधानता के कारण प्रसाद के गद्य में भी अलंकारों का सही प्रयोग मिलता है जिसमें अलंकारिक रूप मिलते हैं ।
4. संवाद शैली – प्रसाद के उपन्यास कहानी और नाटकों में संवाद शैली का प्रयोग पात्र अनुकूल किया है ।
5. वर्णनात्मक शैली – विषय वस्तु का प्रतिपादन घटनाओं और वस्तुओं के चित्र में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग मिलता है।

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