Mahadevi Verma ka Jivan Parichay महादेवी वर्मा

Mahadevi Verma ka Jivan Parichay महादेवी वर्मा (जन्म २६ मार्च, १९०७, फ़र्रुख़ाबाद – मृत्यु ११ सितम्बर, १९८७, प्रयाग) हिन्दी भाषा की प्रख्यात कवयित्री हैं। महादेवी वर्मा की गिनती हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानन्दन पन्त, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता में महादेवी वर्मा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरीं। महादेवी वर्मा ने खड़ी बोली हिन्दी को कोमलता और मधुरता से संसिक्त कर सहज मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार खोला, विरह को दीपशिखा का गौरव दिया, व्यष्टिमूलक मानवतावादी काव्य के चिंतन को प्रतिष्ठापित किया। महादेवी वर्मा के गीतों का नाद-सौंदर्य, पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है।

जीवन परिचय

महादेवी वर्मा अपने परिवार में कई पीढ़ियों के बाद उत्पन हुई। उनके परिवार में दो सौ सालों से कोई लड़की पैदा नहीं हुई थी, यदि होती तो उसे मार दिया जाता था। दुर्गा पूजा के कारण आपका जन्म हुआ। आपके दादा फ़ारसी और उर्दू तथा पिताजी अंग्रेज़ी जानते थे। माताजी जबलपुर से हिन्दी सीख कर आई थी, महादेवी वर्मा ने पंचतंत्र और संस्कृत का अध्ययन किया। महादेवी वर्मा जी को काव्य प्रतियोगिता में चांदी का कटोरा मिला था। जिसे इन्होंने गाँधीजी को दे दिया था। महादेवी वर्मा कवि सम्मेलन में भी जाने लगी थी, वो सत्याग्रह आंदोलन के दौरान कवि सम्मेलन में अपनी कवितायें सुनाती और उनको हमेशा प्रथम पुरस्कार मिला करता था। महादेवी वर्मा मराठी मिश्रित हिन्दी बोलती थी।

जन्म
महादेवी वर्मा का जन्म होली के दिन २६ मार्च, १९०७ को फ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। महादेवी वर्मा के पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा एक वकील थे और माता श्रीमती हेमरानी देवी थीं। महादेवी वर्मा के माता-पिता दोनों ही शिक्षा के अनन्य प्रेमी थे। महादेवी वर्मा को आधुनिक काल की मीराबाई कहा जाता है। महादेवी जी छायावाद रहस्यवाद के प्रमुख कवियों में से एक हैं। हिन्दुस्तानी स्त्री की उदारता, करुणा, सात्विकता, आधुनिक बौद्धिकता, गंभीरता और सरलता महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में समाविष्ट थी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विलक्षणता से अभिभूत रचनाकारों ने उन्हें साहित्य साम्राज्ञी, हिन्दी के विशाल मंदिर की वीणापाणि, शारदा की प्रतिमा आदि विशेषणों से अभिहित करके उनकी असाधारणता को लक्षित किया। महादेवी जी ने एक निश्चित दायित्व के साथ भाषा, साहित्य, समाज, शिक्षा और संस्कृति को संस्कारित किया। कविता में रहस्यवाद, छायावाद की भूमि ग्रहण करने के बावज़ूद सामयिक समस्याओं के निवारण में महादेवी वर्मा ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

शिक्षा
महादेवी वर्मा की प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में हुई। महादेवी वर्मा ने बी.ए. जबलपुर से किया। महादेवी वर्मा अपने घर में सबसे बड़ी थी उनके दो भाई और एक बहन थी। १९१९ में इलाहाबाद में क्रॉस्थवेट कॉलेज से शिक्षा का प्रारंभ करते हुए महादेवी वर्मा ने १९३२ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। तब तक उनके दो काव्य संकलन नीहार और रश्मि प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुके थे। महादेवी जी में काव्य प्रतिभा सात वर्ष की उम्र में ही मुखर हो उठी थी। विद्यार्थी जीवन में ही उनकी कविताऐं देश की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाने लगीं थीं।

विवाह
उन दिनों के प्रचलन के अनुसार महादेवी वर्मा का विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था परन्तु महादेवी जी को सांसारिकता से कोई लगाव नहीं था अपितु वे तो बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थीं और स्वयं भी एक बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहतीं थीं। विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। महादेवी वर्मा की शादी १९१४ में डॉ. स्वरूप नरेन वर्मा के साथ इंदौर में ९ साल की उम्र में हुई, वो अपने माँ पिताजी के साथ रहती थीं क्योंकि उनके पति लखनऊ में पढ़ रहे थे।

विरासत
शिक्षा और साहित्य प्रेम महादेवी जी को एक तरह से विरासत में मिला था। महादेवी जी में काव्य रचना के बीज बचपन से ही विद्यमान थे। छ सात वर्ष की अवस्था में भगवान की पूजा करती हुयी माँ पर उनकी तुकबन्दी
ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन उन्हें लगाती
उनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी न बोले हैं
मां के ठाकुर जी भोले हैं।
वे हिन्दी के भक्त कवियों की रचनाओं और भगवान बुद्ध के चरित्र से अत्यन्त प्रभावित थी। उनके गीतों में प्रवाहित करुणा के अनन्त स्रोत को इसी कोण से समझा जा सकता है। वेदना और करुणा महादेवी वर्मा के गीतों की मुख्य प्रवृत्ति है। असीम दुख के भाव में से ही महादेवी वर्मा के गीतों का उदय और अन्त दोनों होता है।
महिला विद्यापीठ की स्थापना
महादेवी वर्मा ने अपने प्रयत्नों से इलाहाबाद में प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की। इसकी वे प्रधानाचार्य एवं कुलपति भी रहीं। महादेवी वर्मा पाठशाला में हिन्दी-अध्यापक से प्रभावित होकर ब्रजभाषा में समस्या पूर्ति भी करने लगीं। फिर तत्कालीन खड़ी बोली की कविता से प्रभावित होकर खड़ी बोली में रोला और हरिगीतिका छन्दों में काव्य लिखना प्रारम्भ किया। उसी समय माँ से सुनी एक करुण कथा को लेकर सौ छन्दों में एक खण्डकाव्य भी लिख डाला। १९३२ में उन्होंने महिलाओं की प्रमुख पत्रिका चाँद का कार्यभार सँभाला। प्रयाग में अध्यापन कार्य से जुड़ने के बाद हिन्दी के प्रति गहरा अनुराग रखने के कारण महादेवी वर्मा दिनों-दिन साहित्यिक क्रियाकलापों से जुड़ती चली गईं। उन्होंने न केवल चाँद का सम्पादन किया वरन् हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयाग में साहित्यकार संसद की स्थापना की। उन्होंने साहित्यकार मासिक का संपादन किया और रंगवाणी नाट्य संस्था की भी स्थापना की।

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काव्य विशेषताएँ
महादेवी के काव्य में भाव समृद्धि तथा शैल्पिक सौन्दर्य का आकर्षक समन्वय है। आपके काव्य की उभयपक्षीय विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

भाव पक्ष
महादेवी जी के काव्य में आत्मनिवेदन का स्वर प्रधान है। अपने हृदय की विविध अनुभूतियों को ही कवयित्री ने काव्य का विषय बनाया है। अज्ञात प्रियतम के प्रति विरह व्यथा का निवेदन, मिलन का संकल्प, रहस्यमयी संवेदनाएँ और प्रकृति का कोमलकान्त दृश्यांकन आपके गीतों के प्रधान विषय हैं। आध्यात्मिकता और दार्शनिकता के झीने अंचल से आवृत्त आपके मृदुल उदगार एक मोहक भाव जगत् की सृष्टि करते हैं।

रस योजना
महादेवी जी के काव्य का प्रधान रस श्रृंगार है। यद्यपि श्रृंगार के संयोग तथा वियोग दोनो ही पक्षों को कवयित्री ने काव्य का विषय बनाया है, तथापि वियोग की अभिव्यक्ति ही अधिक तल्लीनता से हुई है। यह वियोग लौकिक धरातल पर स्थित होते हुए भी अपनी भव्यता से अलौकिकता के अम्बर का स्पर्श करता चलता है। वह कबीर की भाँति वियोगिनी आत्मा का प्रियतम परमात्मा के प्रति प्रेम निवेदन बनकर सहृदयों के हृदयों को भाव तरंगों में झुलाने लगता है।

वेदना
महादेवी का समस्त काव्य वेदनामय है। यह वेदना लौकिक वेदना से भिन्न आध्यात्मिक जगत् की है, जो उसी के लिए सहज संवेद्य हो सकती है, जिनसे उस अनुभूति-क्षेत्र में प्रवेश किया हो। वैसे महादेवी इस वेदना को उस दुख की भी संज्ञा देती हैं, जो सारे संसार को एक सूत्र में बाँधे रखने की क्षमता रखता है किन्तु विश्व को एक सूत्र में बाँधने वाला दुख सामान्यतया लौकिक दुख ही होता है, जो भारतीय साहित्य की परम्परा में करुण रस का स्थायी भाव होता है। महादेवी ने इस दुख को नहीं अपनाया है। कहती तो हैं कि मुझे दुख के दोनों ही रूप प्रिय हैं, एक वह, जो मनुष्य के संवेदनशील हृदय को सारे संसार से एक अविच्छिन्न बन्धनों में बाँध देता है और दूसरा वह जो काल और सीमा के बन्धन में पड़े हुए असीम चेतन का क्रन्दन है किन्तु उनके काव्य में पहले प्रकार का नहीं, दूसरे प्रकार का क्रन्दन ही अभिव्यक्त हुआ है। यह वेदना सामान्य लोक हृदय की वस्तु नहीं है। सम्भवत इसीलिए रामचन्द्र शुक्ल ने उसकी सच्चाई में ही सन्देह व्यक्त करते हुए लिखा है, इस वेदना को लेकर उन्होंने हृदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखीं, जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियाँ हैं और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना, यह नहीं कहा जा सकता

विषयवस्तु और दृष्टिकोण
वेदना की इस एकान्त साधना के फलस्वरूप महादेवी की कविता में विषयों का वैविध्य बहुत कम है। उनकी कुछ ही कविताएं ऐसी हैं, जिनमें राष्ट्रीय और सांस्कृतिक उद्बोधन अथवा प्रकृति का स्वतन्त्र चित्रण हुआ है। शेष सभी कविताओं में विषयवस्तु और दृष्टिकोण एक ही होने के कारण उनकी काव्यभूमि विस्तृत नहीं हो सकी है। इससे उनके काव्य को हानि और लाभ दोनों हुआ है। हानि यह हुई है कि विषय-परिवर्तन न होने से उनके समस्त काव्य में एकरसता और भावावृत्ति बहुत अधिक है। लाभ यह हुआ है कि सीमित क्षेत्र के भीतर ही कवयित्री ने अनुभूतियों के अनेकानेक आयामों को अनेक दृष्टिकोण से देख-परखकर उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म भेद-प्रभेदों को बिम्बरूप में सामने रखते हुए चित्रित किया है। इस तरह उनके काव्य में विस्तारगत विशालता और दर्शनागत गुरुत्व भले ही न मिले, पर उनकी भावनाओं की गम्भीरता, अनुभूतियों की सूक्ष्मता, बिम्बों की स्पष्टता और कल्पना की कमनीयता के फलस्वरूप गाम्भीर्य और महत्ता अवश्य है। इस तरह उनके काव्य विस्तार का नहीं गहराई का काव्य है।

प्रकृति निरुपण
प्रकृति के सौन्दर्य के प्रति कवयित्री की संवेदनशीलता में कोई कमी नहीं है, किन्तु प्रकृति को आलम्बन के रूप में कम ही कविता का विषय बनाया गया है। यह स्वल्प शब्द चित्र भी बड़े मौलिक और मनोहारी हैं। प्रकृति को उद्दीपन विभाव के रूप में महादेवी ने बड़े कलात्मक और मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत किया है। वे भावों को प्रखरता तथा अनुभूतियों को तरल गम्भीरता प्रदान करके, कथ्य को अत्यन्त हृदयग्राही बना देती है। महादेवी जी का काव्य छायावादी काव्यशैली की सभी विशेषताओं से विभूषित है। वैयक्तिकता, प्रकृति का मानवीकरण, श्रृंगार की साध्वी अभिव्यक्ति, सौन्दर्य निरुपण, लाक्षणिक अभिव्यक्ति तथा मानवतावादी दृष्टि आदि आपकी रचनाओं में मौलिक भाव-भंगिमा में प्रस्तुत है। कबीर और जायसी के पश्चात् काव्यपरक रहस्यवाद के दर्शन हिन्दी में महादेवी जी के ही काव्य में होते हैं। महादेवी अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रणय निवेदन के क्षणों में आध्यात्मिक छोरों का स्पर्श करने लगती हैं। महादेवी जी ने लोक चेतना से भी स्वयं को पूर्णतया विच्छिन्न नहीं किया है। उनके पास भी सन्देश हैं, प्रेरणा मार्ग-दर्शन है।

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अनुभूतियाँ
महादेवी वर्मा का काव्य अनुभूतियों का काव्य है। उसमें देश, समाज या युग का चित्रांकन नहीं है, बल्कि उसमें कवयित्री की निजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति हुई है। उनकी अनुभूतियाँ प्रायः अज्ञात प्रिय के प्रति मौन समर्पण के रूप में हैं। उनका काव्य उनके जीवन काल में आने वाले विविध पड़ावों के समान है। उनमें प्रेम एक प्रमुख तत्त्व है जिस पर अलौकिकता का आवरण पड़ा हुआ है। इनमें प्रायः सहज मानवीय भावनाओं और आकर्षण के स्थूल संकेत नहीं दिए गए हैं, बल्कि प्रतीकों के द्वारा भावनाओं को व्यक्त किया गया है। कहीं-कहीं स्थूल संकेत दिए गए हैं-
मेरी आहें सोती है इन ओठों की ओटों में,
मेरा सर्वस्व छिपा है इन दीवानी चोटों में।
कवियत्री ने सर्वत्र अपनी प्रणय-भावना का उन्नयन और परिष्कार किया है। इनके प्रेम का आलंबन विराट एवं विशाल है, जो अलौकिक है-
बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ ।
नींद भी मेरी अचल निस्पंद कण-कण में,
प्रथम जागृति थी जगत् के प्रथम स्पंदन में,
प्रलय में मेरा पता पद-चिह्न जीवन में।
इन्होंने अन्य छायावादी कवियों की तरह प्रकृति पर सर्वत्र चेतना का आरोप किया है और उसके साथ विविध मधुर संबंधों की कल्पनाएँ की हैं-
रजनी ओढ़े जाती थी !
झिलमिल तारों की जाली,
उसके बिखरे वैभव पर,
जब रोती थी उजियाली।
दुःख-पीड़ा और विषाद महादेवी वर्मा के काव्य का मूल स्वर है और इन्हें सुख की अपेक्षा दुःख अधिक प्रिय है। परन्तु इनमें विषाद का वह भाव नहीं है जो कर्म शक्ति को कुंठित कर देता हो। इनमें संयम और त्याग है तथा दूसरों का हित करने की प्रबल आकांक्षा है-
मैं नीर भरी दुःख की बदली!
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा कभी न अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी थी कल मिट आज चली।
महादेवी का काव्य वर्णनात्मक और इतिवृत्तात्मक नहीं है। आन्तरिक सूक्ष्म अनुभूतियों की अभिव्यक्ति उन्होंने सहज भावोच्छवास के रूप में की है। इस कारण उसकी अभिव्यंजना- पद्धति में लाक्षणिकता और व्यंजकता का बाहुल्य है। रूपकात्मक बिम्बों और प्रतीकों के सहारे उन्होंने जो मोहक चित्र उपस्थित किये हैं, वे उनकी सूक्ष्म दृष्टि और रंगमयी कल्पना की शक्तिमत्ता का परिचय देते हैं। ये चित्र उन्होंने अपने परिपार्श्व, विशेषकर प्राकृतिक परिवेश से लिए हैं पर प्रकृति को उन्होंने आलम्बन रूप में बहुत कम ग्रहण किया। प्रकृति महादेवी वर्मा के काव्य में सदैव उद्दीपन, अलंकार, प्रतीक और संकेत के रूप में ही चित्रित हुई है। इसी कारण प्रकृति के अति परिचित और सर्वजनसुलभ दृश्यों या वस्तुओं को ही उन्होंने अपने काव्य का उपादान बनाया है। उसके असाधारण और अल्पपरिचित दृश्यों की ओर उनका ध्यान नहीं गया है। फिर भी सीमित प्राकृतिक उपादानों के द्वारा उन्होंने जो पूर्ण या आंशिक बिम्ब चित्रित किए हैं, उनसे उनकी चित्रविधायिनी कल्पना का पूरा परिचय मिल जाता है। इसी कल्पना के दर्शन महादेवी वर्मा के उन चित्रों में भी होते हैं, जो उन्होंने शब्दों से नहीं, रंगों और तूलिका के माध्यम से निर्मित किए हैं। उनके ये चित्र दीपशिखा और यामा में कविताओं में प्रकाशित हुए हैं।

भाषा-शैली
महादेवी अपनी काव्य भाषा की निर्मात्री स्वयं ही हैं, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। अभिव्यक्ति की जो सामर्थ्य, भाव व्यंजना का जो मार्मिक सौष्ठव, आपकी भाषा वहन करती है, वह अन्यत्र पंतजी में ही प्राप्त होता है। आपकी भाषागत कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
आपकी भाषा का एक विशिष्ट स्तर है, जो स्वभावतः संस्कृत शब्दावली की ओर झुका हुआ है। तत्सम शब्द प्रधान होते हुए भी इस भाषा रूप में क्लिष्टता या रूक्षता नहीं हैं। उसमें प्रवाह है, लय है।
संस्कृत तत्सम शब्दावली के प्रति महादेवी की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। आपने अपेक्षाकृत सरल शब्दावली का भी सहज भाव से प्रयोग किया है; यथा-
विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली।
महादेवी जी ने भाषा को अद्भुत मृदुता और मधुरता प्रदान की है। भाव और लय का मनोहारी संगम प्रस्तुत करने में आपकी भाषा का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है।
लाक्षणिकता महादेवी जी की शब्द चित्रकारिता में सहायक तूलिका कही जाय तो अनुचित नहीं होगा। शब्द से कहाँ- क्या अर्थ ध्वनित होना है, इसे उनकी भाषा मर्मज्ञता भली-भाँति जानती है।
महादेवी जी की रचना-शैली की प्रमुख विशेषताएँ उसकी भावतरलता, वैयक्तिकता, प्रतीकात्मकता, चित्रात्मकता, आलंकारिता, छायावादी तथा रहस्यात्मक अभिव्यक्ति आदि हैं।

अलंकरण
महादेवी जी ने परम्परागत एवं नवीन, सभी अलंकारों का कलात्मकता से उपयोग किया है। उपमानों की मौलिकता एवं मनमोहक विधान आपके अलंकरण की विशेषताएँ हैं। रूपक आपका प्रिय अलंकार है-
ले उषा ने किरण अक्षत, हास रोली,
रात अंकों से पराजय राख धोली।
महादेवी जी ने छायावादी गीत लिखे हैं और गीतों के छन्द बद्ध में वह पूर्ण दक्ष हैं। अनेक स्थलों पर उनकी गीति लोकगीत की लहरियों में तरंगित प्रतीत होती है। इनके गीतों में लय, संगीतात्मकता तथा नाद सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। अपनी काव्यगत विशिष्टिताओं के लिए महादेवी जी काव्य-प्रेमियों के लिए सदैव सम्मानीय और स्मरणीय रहेंगी। उनका काव्य विश्व-साहित्य की निधि है।

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रेखाचित्रकार
महादेवी वर्मा एक सफल रेखाचित्रकार, कवयित्री, और विचारक है। उन्होंने कई रेखाचित्र लिखें हैं जिनमें नीलकंठ मोर, घीसा, सोना, गौरा आदि काफ़ी प्रसिद्ध हैं। मानव एक श्रेष्ठ प्राणी होने पर भी पशुओं के प्रति उसका व्यवहार सराहनीय डाला हैं। पशु-पक्षी भी प्रेम के लिए लालायित रहते हैं और प्रेम दिखाने पर आनंदविभोर हो उठते हैं। बेजुबान होने पर भी स्नेह के कई मूक प्रर्दशन होते हैं। अपने असीम आनंद की अभिव्यक्ति सुंदर आँखों के भाव से प्रकट करते हैं। परन्तु मानव अपने स्वार्थ के कारण इन बेजुबान जानवरों पर इतना अत्याचार और निर्दय व्यवहार करता है और उन पर कितना जुल्म करता है इसका कोई अंत नहीं। मानव द्वारा इतनी यातना सह कर भी पशु मानव के स्वभाव से अब तक अनजाना है। मानव का यह स्वार्थ अंत में वेदना का कार्य और कारण बन जाता है, इसी बात पर प्रकाश डालना ही महादेवी वर्मा का मुख्य ध्येय है।

धार्मिक विचार
महादेवी ने स्वयं लिखा है, मां से पूजा और आरती के समय सुने सूर, तुलसी तथा मीरा आदि के गीत मुझे गीत रचना की प्रेरणा देते थे। माँ से सुनी एक करुण कथा को मैंने प्रायः सौ छंदों में लिपिबद्ध किया था। पड़ोस की एक विधवा वधू के जीवन से प्रभावित होकर मैंने विधवा, अबला शीर्षकों से शब्द चित्र लिखे थे जो उस समय की पत्र्किाओं में प्रकाशित भी हुए थे। व्यक्तिगत दुःख समष्टिगत गंभीर वेदना का रूप ग्रहण करने लगा। करुणा बाहुल होने के कारण बौद्ध साहित्य भी मुझे प्रिय रहा है। महादेवी वर्मा ने अपने आराध्य को, प्रियतम को करुणामय (ब्रह्म) के रूप में सम्बोधित किया है। महादेवी पूजा और अर्चना के बाह्य उपकरणों को स्वीकार नहीं करती हैं। उनका लघुतम जीवन ही उस असीम का सुन्दर मंदिर है।
क्या पूजा क्या अर्चना रे
उस असीम का सुन्दर मंदिर
मेरा लघुतर जीवन रे।
आधुनिक मीरां
महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की मीरां भी कहा जाता है। भक्ति काल में जो स्थान कृष्ण भक्त मीरां को प्राप्त है, आधुनिक काल में वह स्थान महादेवी वर्मा को मिला है। मीरां का प्रियतम सगुण, साकार गिरधर गोपाल है जिसके प्रति वे समर्पित रही, तो दूसरी ओर महादेवी के प्रियतम असीम निर्गुण निराकार (ब्रह्म) हैं और उसके प्रति वे समर्पित हैं। महादेवी अपने आप में एक जीवन गाथा हैं। महादेवी का प्रसिद्ध गीत, मैं नीर भरी दुःख की बदली इस बात का परिचायक है कि उनका यह जीवन दर्शन है जो मीरांबाई जैसा ही है।
व्यक्तित्व में एकाकीपन की झलक
महादेवी की घनिष्ठतम मित्र, सहपाठिनी कवि सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी के अन्तरंग क्षणों की बात का उल्लेख करते हुए प्रसिद्ध कथाकार और प्रेमचन्द की जीवनी कलम का सिपाही के लेखक अमृत राय ने लिखा हैः- दोनों स्त्रियां अपनी बातों में लीन, अपने परितृप्त बाल बच्चों में मगन बतियाये जा रही थीं कि एकाएक लगा कि जैसे कोई फूट फूट कर रो पड़ा। वह रोना जैसे फूटा था वैसे ही भीतर समा भी गया पर कमरे में एकाएक सन्नाटा छा गया। जो व्यक्ति रो पड़ा उसका यह रूप इतना अप्रत्याशित था कि सब जैसे सकते में आ गये। शुभ्रवसना, प्रसन्नवदना महादेवी जी जिनको लोगों ने सदा हंसते ही देखा था, वो कभी इस तरह फूट कर रो भी पड़ेंगी, इसकी किसी को कल्पना भी नहीं थी पर अनजाने ही, अपने सुख दुःख में भूली, अपने परिवार में मगन उन गृहणियों ने उनकी कौन सी दुखती रग छू दी थी कि उनका वह हंसमुख मुखौटा बरबस हट गया। उस क्षण मैंने जिस निचाट सूने एकाकीपन की एक झलक पायी, वह सचमुच डरा देने वाली थी पर उसी के साथ साथ ऐसी स्त्री के लिए मेरे मन का आदर जैसे और सौ गुना बढ़ गया जिसने इस पुरुषशासित रूढ़िग्रस्त समाज में अकेले रह कर जीवन को बिना किसी दैन्य या कमज़ोरी के इस बहादुरी के साथ जिया।

निधन
महादेवी वर्मा का निधन ११ सितम्बर, १९८७, को प्रयाग में हुआ था। महादेवी वर्मा ने निरीह व्यक्तियों की सेवा करने का व्रत ले रखा था। वे बहुधा निकटवर्ती ग्रामीण अंचलों में जाकर ग्रामीण भाई-बहनों की सेवा सुश्रुषा तथा दवा निःशुल्क देने में निरत रहती थी। वास्तव में वे निज नाम के अनुरूप ममतामयी, महीयसी महादेवी थी। भारतीय संस्कृति तथा भारतीय जीवन दर्शन को आत्मसात किया था। उन्होंने भारतीय संस्कृति के सम्बन्ध में कभी समझौता नहीं किया। महादेवी वर्मा ने एक निर्भीक, स्वाभिमाननी भारतीय नारी का जीवन जिया। राष्ट्र भाषा हिन्दी के सम्बन्ध में उनका कथन है हिन्दी भाषा के साथ हमारी अस्मिता जुडी हुई है। हमारे देश की संस्कृति और हमारी राष्ट्रीय एकता की हिन्दी भाषा संवाहिका है।

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