Malik Mohammad Jayasi ka jivan parichay मलिक मुहम्मद जायसी

Malik Mohammad Jayasi ka jivan parichay  मलिक मुहम्मद जायसी भक्तिकाल की निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा व मलिक वंश के कवि है। इनका जन्म- १३९७ ई॰ और १४९४ ई॰ के बीच में हुआ, और मृत्यु- १५४२ ई. में हुआ। जायसी अत्यंत उच्चकोटि के सरल और उदार सूफ़ी महात्मा थे। हिन्दीके प्रसिद्ध सूफ़ी कवि, जिनके लिए केवल जायसी शब्द का प्रयोग भी, उनके उपनाम की भाँति, किया जाता है। यह इस बात को भी सूचित करता है कि वे जायस नगर के निवासी थे। इस संबंध में उनका स्वयं भी कहना है,

जायस नगर मोर अस्थानू।
नगरक नाँव आदि उदयानू।
तहाँ देवस दस पहुने आएऊँ।
भा वैराग बहुत सुख पाएऊँ॥

इससे यह भी पता चलता है कि उस नगर का प्राचीन नाम उदयान था, वहाँ वे एक पहुने जैसे दस दिनों के लिए आये थे, अर्थात उन्होंने अपना नश्वर जीवन प्रारंभ किया था अथवा जन्म लिया था और फिर वैराग्य हो जाने पर वहाँ उन्हें बहुत सुख मिला था।

जन्म
जायस नाम का एक नगर उत्तर प्रदेश के रायबरेली ज़िले में आज भी वर्तमान है, जिसका पुराना नाम उद्यान नगर, उद्यानगर या उज्जालिक नगर बतलाया जाता है तथा उसके कंचाना खुर्द नामक मुहल्ले में मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म स्थान होना कहा जाता है। कुछ लोगों की धारणा है कि जायसी की जन्म भूमि गाजीपुर में कहीं हो सकती है किन्तु इसके लिए कोई प्रमाण नहीं मिलता। जायस के विषय में कवि ने अन्यत्र भी कहा है,

जायस नगर धरम अस्थानू।
तहवाँ यह कवि कीन्ह बखानू।
इससे जान पड़ता है कि वह उस नगर को धर्म का स्थान समझता था और वहाँ रहकर उसने अपने काव्य पद्मावत की रचना की थी। यहाँ पर नगर का धर्म स्थान होना कदाचित यह भी सूचित करता है कि जनश्रुति के अनुसार वहाँ उपनिषदकालीन उद्दालक मुनि का कोई आश्रम था। गार्सां द तासी नामक फ़्रेंच लेखक का तो यह भी कहना है कि जायसी को प्राय: जायसीदास के नाम से अभिहित किया जाता रहा है।

जन्म को लेकर मतभेद
जायसी की किसी उपलब्ध रचना के अन्तर्गत उसकी निश्चित जन्म-तिथि अथवा जन्म-संवत का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं पाया जाता। एक स्थल पर वे कहते हैं,
भा आवतार मोर नौ सदी।
तीस बरिख ऊपर कवि बदी।
जिसके आधार पर केवल इतना ही अनुमान किया जा सकता है कि उनका जन्म सम्भवत: ८०० हिजरी एवं ९०० हिजरी के मध्य, अर्थात सन् १३९७ ई॰ और १४९४ ई॰ के बीच किसी समय हुआ होगा तथा तीस वर्ष की अवस्था पा चुकने पर उन्होंने काव्य-रचना का प्रारम्भ किया होगा।
परिवार

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जायसी के नाम के पहले ‘मलिक’ उपाधि लगी रहने के कारण कहा जाता है कि उनके पूर्वज ईरान से आये थे और वहीं से उनके नामों के साथ यह ज़मींदार सूचक पदवी लगी आ रही थी किन्तु उनके पूर्वपुरुषों के नामों की कोई तालिका अभी तक प्राप्त नहीं हो सकी है। उनके पिता का नाम मलिक राजे अशरफ़ बताया जाता है और कहा जाता है कि वे मामूली ज़मींदार थे और खेती करते थे। इनके नाना का नाम शेख अल-हदाद खाँ था। स्वयं जायसी को भी खेती करके जीविका-निर्वाह करना प्रसिद्ध है। कुछ लोगों का अनुमान करना कि मलिक शब्द का प्रयोग उनके किसी निकट सम्बन्धी के ‘बारह हज़ार का रिसालदार’ होने के कारण किया जाता होगा अथवा यह कि सम्भवत: स्वयं भी उन्होंने कुछ समय तक किसी सेना में काम किया होगा, प्रमाणों के अभाव में संदिग्ध हो जाता है। सैयद आले का मत है कि “मोहल्ला गौंरियाना के निगलामी मलिक ख़ानदान से थे” और “उनके पुराने सम्बन्धी मुहल्ला कंचाना में बसे थे।” उन्होंने यह बतलाया है कि जायसी का मलिक कबीर नाम का एक पुत्र भी था। मलिक मुहम्मद जायसी कुरूप और एक आँख से काने थे। कुछ लोग उन्हें बचपन से ही काने मानते हैं जबकि अधिकांश लोगों का मत है कि चेचक के प्रकोप के कारण ये कुरूप हो गये थे और उसी में इनकी एक आँख चली गयी थी। उसी ओर का बायाँ कान भी नाकाम हो गया। अपने काने होने का उल्लेख उन्होंने स्वयं ही किया है :-
एक नयन कवि मुहम्मद गुमी।
सोइ बिमोहो जेइ कवि सुनी।। चांद जइस जग विधि ओतारा। दीन्ह कलंक कीन्ह उजियारा।।
जग सुझा एकह नैनाहां। उवा सूक अस नखतन्ह मांहां।। जो लहिं अंबहिं डाभ न होई। तो लाहि सुगंध बसाई न सोई।।
कीन्ह समुद्र पानि जों खारा। तो अति भएउ असुझ अपारा।। जो सुमेरु तिरसूल बिना सा। भा कंचनगिरि लाग अकासा।।
जौं लहि घरी कलंक न परा। कांच होई नहिं कंचन करा।। एक नैन जस दापन, और तेहि निरमल भाऊ। सब रुपवंत पांव जहि, मुख जोबहिं कै चाउ।।
मुहम्मद कवि जो प्रेम या, ना तन रकत न मांस।
जेइं मुख देखा तइं हंसा, सुना तो आये आंहु।।
उपर्युक्त पंक्तियों से अनुमान होता है कि बाएँ कान से भी उन्हें कम सुनाई पड़ता था। एक बार जायसी शेरशाह के दरबार में गए, तो बादशाह ने इसका मुँह देखकर हँस दिया। जायसी ने शांत भाव से पूछा –
मोहि कां इससि कि कोहरहि?

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अर्थात तू मुझ पर हंसा या उस कुम्हार पर,
इस पर शेरशाह ने लज्जित होकर क्षमा माँगी।
जायसी एक सन्त प्रकृति के गृहस्थी थे। इनके सात पुत्र थे लेकिन दीवार गिर जाने के कारण सभी उसमें दब कर मर गये थे। तभी से इनमें वैराग्य जाग गया और ये फ़कीर बन गये।
शिक्षा

जायसी की शिक्षा भी विधिवत् नहीं हुई थी। जो कुछ भी इन्होनें शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की वह मुसलमान फ़कीरों, गोरखपन्थी और वेदान्ती साधु-सन्तों से ही प्राप्त की थी।
गुरु-परम्परा

जायसी ने अपनी कुछ रचनाओं में अपनी गुरु-परम्परा का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है, “सैयद अशरफ, जो एक प्रिय सन्त थे मेरे लिए उज्ज्वल पन्थ के प्रदर्शक बने और उन्होंने प्रेम का दीपक जलाकर मेरा हृदय निर्मल कर दिया। उनका चेला बन जाने पर मैं अपने पाप के खारे समुद्री जल को उन्हीं की नाव द्वारा पार कर गया और मुझे उनकी सहायता से घाट मिल गया, वे जहाँगीर चिश्ती चाँद जैसे निष्कलंक थे, संसार के मखदूम (स्वामी) थे और मैं उन्हीं के घर का सेवक हूँ”। “सैयद अशरफ जहाँगीर चिश्ती के वंश में निर्मल रत्न जैसे हाज़ी हुए तथा उनके अनन्तर शेख मुबारक और शेख कमाल हुए”।
चार मित्रों का वर्णन

जायसी ने पद्मावत (२२) में अपने चार मित्रों की चर्चा की है, जिनमें से युसुफ़ मलिक को ‘पण्डित और ज्ञानी’ कहा है, सालार एवं मियाँ सलोने की युद्ध-प्रियता एवं वीरता का उल्लेख किया है तथा बड़े शेख को भारी सिद्ध कहकर स्मरण किया है और कहा है कि ये चारों मित्र उनसे मिलकर एक चिह्न हो गए थे परन्तु उनके पूर्वजों एवं वंशजों की भाँति इन लोगों का भी कोई प्रमाणिक परिचय उपलब्ध नहीं है।
जायसी का खुद के बारे में कथन

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जायसी सैय्यद अशरफ़ को प्यारे पीर मानते हैं और स्वयं को उनके द्वार का मुरीद बताते हैं। उनकी काव्य शैली में –
सो मोरा गुरु तिन्ह हों चला।
धोवा पाप पानिसिर मेला।। पेम पियालाया पंथ लखावा। अरपु चाखि मोहिं बूँद चखावा।। जो मधु चढ़ा न उतरइ कावा।
परेउ माति पसउं फेरि अरवा।।
एक स्थान पर वो अपने बारे में काफ़ी विनम्र भाव से कहते हैं:-
मुहम्मद मलिक पेम मधुभोरा।
नाउँ बड़ेरा दरपन थोरा।। जेव- जेंव बुढ़ा तेवं- तेवं नवा। खुदी कई ख्याल न कवा।। हाथ पियाला साथ सुरांई। पेम पीतिलई आरे निबाही।। बुधि खोई और लाज गँवाई। अजहूँ अइस धरी लरिकाई।। पता न राखा दुहवई आंता। माता कलालिन के रस मांता।। दूध पियसववइ तेस उधारा। बालक होई परातिन्ह बारा।। खउं लाटउं चाहउं खेला। भएउ अजान चार सिर मेला।।
पेम कटोरी नाइके मता पियावइ दूध।
बालक पीया चाहइ, क्या मगर क्या बूध।।
इस पंक्तियों से लगता है कि ये प्रेम- मधु के भ्रमर थे। जायसी संसार को अस्थिर मानते थे, उनके हिसाब से प्रेम और सद्भाव ही स्थिर है या रहेगा, जबकि संसार की तमाम वस्तुएँ अस्थिर है। जायसी ने संसार की अस्थिरता का वर्णन अन्य स्थल पर इस प्रकार किया है —
यह संसार झूठ थिर नाहिं।
तरुवर पंखि तार परछाहीं।। मोर मोर कइ रहा न कोई। जाऐ उवा जग अथवा सोई।।
समुद्र तरंग उठै अद्य कूपा। पानी जस बुलबुला होई। फूट बिस्मादि मिलहं जल सोई।। मलिक मुहम्मद पंथी घर ही माहिं उदास।
कबहूँ संवरहि मन कै, कवहूँ टपक उबास।।
एक स्थान पर चित्ररेखा में उन्होंने अपने बारे में लिखा है:-
मुहमद सायर दीन दुनि, मुख अंब्रित बेनान। बदन जइस जग चंद सपूरन, एक जइस नेनान।

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