Prataap Narayan mishra ka jeevan parichay प्रताप नारायण मिश्र का जीवन परिचय

By | September 25, 2016

जीवन परिचय-

पंडित प्रताप नारायण मिश्र का जन्म सन 1856 ईस्वी में उन्नाव जिले के बैजे नामक गांव में हुआ था।
इनके पिता संकटा प्रसाद एक विख्यात ज्योतिषी थे और इसी विद्या के माध्यम से वे कानपुर में आकर बसे थे। पिता ने प्रताप नारायण को भी ज्योतिष की शिक्षा देना चाहा पर इनका मन उसमें नहीं रम सका। अंग्रेजी शिक्षा के लिए इन्होंने स्कूल में प्रवेश लिया किंतु उन का मन अध्ययन में नहीं लगा यद्यपि इन्होंने मन लगाकर किसी भी भाषा का अध्ययन नहीं किया तथापि हिंदी, उर्दू, फारसी, संस्कृत और बांग्ला का अच्छा ज्ञान हो गया था। एक बार ईश्वरचंद्र विद्यासागर इनसे मिलने आए तो उन्होंने उनके साथ पूरी बातचीत बंगला भाषा में ही किया। वस्तुतः मिश्र जी ने स्वाध्याय एवं सुसंगती से जो ज्ञान एवं अनुभव प्राप्त किया उसे गद्य, पद एवं निबंध आदि के माध्यम से समाज को अर्पित कर दिया। मात्र 38 वर्ष की अल्प आयु में ही सन 1894 में कानपुर में इनका निधन हो गया ।

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साहित्यिक परिचय-

मिश्र जी ने अपना साहित्यिक जीवन “ख्याल” एवं “लावनियों” के माध्यम से प्रारंभ किया क्योंकि आरंभ में उनकी रुचि लोक साहित्य का सृजन करने में थी। यही से एक साहित्यिक पथ के सतत प्रहरी बन गए। कुछ वर्षों के उपरांत ही यह गद्य लेखन के क्षेत्र में उतर आए। मिश्र जी भारतेंदु हरिश्चंद्र के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होने के कारण उनको अपना गुरु मानते थे। उनकी जैसी ही व्यवहारिक भाषा शैली अपनाकर मिश्र जी ने कई मौलिक और अनूदित रचनाएं लिखीं। तथा ब्राम्हण एवं हिंदुस्तान नामक पत्रों का सफलतापूर्वक संपादन किया।
भारतेंदु जी की ‘कवि-वचन-सुधा’ से प्रेरित होकर मिश्र जी ने कविताएं भी लिखी उन्होंने कानपुर में एक नाटक सभा की स्थापना की जिसके माध्यम से पारसी थियेटर के समानांतर हिंदी का अपना रंगमंच खड़ा करना चाहते थे। यह स्वयं भारतेंदु जी की तरह एक कुशल अभिनेता थे। बांग्ला के अनेक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद करके भी इन्होंने हिंदी साहित्य की वृद्धि की उनकी साहित्यिक विशेषता ही थी कि ‘दांत’ ‘भौं’ ‘वृद्ध’ ‘धोखा’ ‘बात’ ‘मुच्छ’ जैसे साधारण विषयों पर भी चमत्कारिक एवं असाधारण निबंध लिखे।

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रचनाएं-

मिश्र जी ने अपनी अल्प आयु में ही लगभग 40 पुस्तकों की रचना की। इनमें अनेक कविताएं, नाटक, निबंध, आलोचनाएं आदि सम्मिलित हैं। इनकी यह कृतियां मौलिक एवं अनूदित दोनों प्रकार की है।
मौलिक
निबंध -संग्रह प्रताप पीयूष, निबंध नवनीत, प्रताप समीक्षा।
नाटक- कली प्रभाव, हठी हम्मीर, गौ संकट।
रूपक- कलि कौतुक, भारतदुर्दशा।
प्रहसनज्वारी खुआरी, समझदार की मौत।
काव्य- मन की लहर, श्रृंगार विलास, लोकोक्ति-शतक, प्रेम-पुष्पवली, दंगल खंड, तृप्यंताम, ब्रांडला स्वागत, मानस विनोद, शैव-सर्वस्व, प्रताप लहरी।
संग्रह- प्रताप संग्रह, रसखान शतक।
संपादन- ब्राम्हण एवं हिंदुस्तान ।
अनुदित- पंचामृत, चरिताष्टक,वचनावली, राजसिंह, राधारानी, कथामाला, संगीत शाकुंतल आदि।

भाषा शैली

सर्वसाधारण के लिए अपनी रचनाओं को ग्राह्य बनाने के उद्देश्य से मिश्र जी ने सर्वसाधारण की बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है इसमें उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है जैसे कलामुल्लाह, वर्ड ऑफ गॉड आदि। यत्र तत्र कहावतें मुहावरे एवं ग्रामीण शब्दों के प्रयोग से उनके वाक्य में रत्न की भांति ये शब्द जड़ जाते हैं। अतः भाषा प्रवाहयुक्त सरल एवं मुहावरेदार है।

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